Migratory Birds : भारत में ठंड की शुरुआत कब होती है ? बीते कुछ सालों से इसका ठीक ठीक उत्तर देना मुश्किल होता जा रहा है. लेकिन आप अंदाजन यह कह सकते हैं कि सितंबर महीने की शुरुआत से ठंड दसतक देना प्ररांभ कर देता है. इस अंजाद के पीछे जो वजह है वो ये कि हर साल सितंबर का महीना आते ही भारत का आसमान एक अनोखे प्राकृतिक चमत्कार का गवाह बनता है. लाखों-करोड़ों प्रवासी पक्षी अपने बर्फ से ढके असली घरों को छोड़कर हजारों किलोमीटर की उड़ान भरते हैं और सर्दियां बिताने भारत पहुंचते हैं. पक्षियों का सफर किसी टूरिस्ट ट्रिप की तरह नहीं, बल्कि जीवन और अस्तित्व की लड़ाई है. ये पक्षी मुख्य रूप से साइबेरिया, आर्कटिक रूस, मंगोलिया, चीन के तिब्बत पठार, कजाकिस्तान के स्टेपी इलाके और स्कैंडिनेविया (नॉर्वे, स्वीडन, फिनलैंड) से आते हैं. यात्रा सितंबर के पहले हफ्ते से शुरू होकर नवंबर के अंत तक चलती है. ये पक्षी ठंड बिताने भारत आते हैं.
कौन-कौन से पक्षी भारत आते है?
ठंड के इस मौसम में धीरे धीरे ये पक्षी भारत आते हैं. सबसे पहले सितंबर में छोटे और तेज उड़ान भरने वाले पक्षी आते हैं, जैसे Amur Falcon और रोज़ी स्टार्लिंग. अक्टूबर में बड़ी संख्या में बतखें, कलहंस और फ्लेमिंगो भारत पहुंचते हैं. सबसे आखिर में Bar-headed Goose और साइबेरियन क्रेन नवंबर में आते हैं. आंकड़ों की बात करें तो हर साल 50–60 लाख तक बतखें, 5–6 लाख फ्लेमिंगो भारत आते हैं, जबकि साइबेरियन क्रेन अब घटकर सिर्फ 50–70 के आसपास रह गए हैं.
भारत कैसे आते है प्रवासी पक्षी
सात समंदर पार भारत आने के लिए वैसे तो कई रास्ते हैं लेकिन ये प्रवासी पक्षी. दो सबसे बड़े हवाई रास्ते का उपयोग करते हैं. इसमें पहला है हिमालय के ऊपर से सीधी उड़ान. प्रवासी पक्षियों के लिए यह सबसे खतरनाक और मुश्किल रास्ता होता है. पक्षी हिमालय के ऊपर से उड़कर नेपाल और उत्तराखंड के रास्ते भारत में प्रवेश करते हैं. बार-हेडेड गूज तो 8 से 9 हजार मीटर की ऊंचाई पर उड़ते हैं, जहां ऑक्सीजन बेहद कम होती है. फिर भी उनके फेफड़े और खून इतनी ताकत होती है कि वे माउंट एवरेस्ट से भी ऊंची उड़ान भर लेते हैं. दूसरा रास्ता है पाकिस्तान होकर पश्चिमी भारत का रास्ता. हिंदुकुश और कराकोरम पर्वत श्रृंखलाओं को पार कर पाकिस्तान होते हुए पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में इन पक्षियों का प्रवेश होता है. यह रास्ता भी बेहद लंबा और जोखिम भरा होता है.
भारत का पता कैसे ढूंढ़ते है ये पक्षी?
प्रवासी पक्षियों की नेविगेशन क्षमता विज्ञान के लिए भी रहस्य से कम नहीं है. जानकारों की मानें तो इनके दिमाग और चोंच में एक खास क्रिस्टल होता है, जिसे मैग्नेटाइट कहते हैं. इससे ये पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र को बिल्कुल कम्पास की सुई की तरह महसूस करते हैं. एक तरफ ये दिन में उड़ते समय ये सूरज की दिशा से रास्ता तय करते हैं. बादलों में भी इन्हें सूरज की अल्ट्रावायलेट किरणें दिख जाती हैं. तो दूसरी तरफ रात में उड़ते समय ये तारों से दिशा पहचानते हैं. इनकी याददाश्त इतनी मजबूत होती है कि इनके दिमाग का एक हिस्सा पूरे आसमान का नक्शा याद रखता है. ऊंचाई पर बहने वाली तेज हवाओं (जेट स्ट्रीम) का सहारा लेकर ये सैकड़ों किलोमीटर बिना पंख हिलाए उड़ते रहते हैं. इसके साथ जो पक्षी एक बार रास्ता तय करते हैं, वे हर साल उसी झील, उसी खेत और उसी दर्रे से लौटते हैं. हैरानी की बात यह है कि पहली बार उड़ने वाले बच्चे भी बिना माता-पिता के सही जगह पहुंच जाते हैं, क्योंकि रास्ते की जानकारी उनके DNA में पहले से लिखी होती है.
भारत ही क्यों आते हैं ये पक्षी?
ईरान, इराक और मिडिल ईस्ट के कई पुराने दलदल सूख चुके हैं और शिकार भी बढ़ गया है. अब भारत उन गिने-चुने देशों में है जहां लाखों हेक्टेयर वेटलैंड्स अभी भी सुरक्षित हैं.
- सर्दियों का सुरक्षित आशियाना
साइबेरिया और आर्कटिक इलाकों में सर्दियों में तापमान –50 डिग्री तक चला जाता है. हर तरफ बर्फ जम जाती है. ऐसे में वहां न पानी मिलता है, न भोजन.
भारत में उसी समय हल्की ठंड, भरपूर धूप, झीलें, नदियां, दलदल, धान के खेत और मछली के तालाब मौजूद रहते हैं.
- हिमालय की सुरक्षा ढाल
हिमालय उत्तर से आने वाली बर्फीली हवाओं को रोक लेता है. ठीक वैसे ही जैसे “उत्तर की दीवार” किसी काल्पनिक दुनिया में सुरक्षा देती है.
- हजारों साल पुराना रिश्ता
साइबेरियन क्रेन जैसे पक्षी पिछले 10 हजार सालों से भारत आते रहे हैं. यह रिश्ता अब उनके खून और DNA में बस चुका है.
भारत में कहां-कहां बनता है इनका बसेरा?
प्रवासी पक्षियों का यह दस्ता पूरे भारत में दिखता है. नागालैंड और मणिपुर के पहाड़ों में अक्टूबर-नवंबर के दौरान आसमान पक्षियों से काला पड़ जाता है. गुजरात में फ्लेमिंगो कच्छ के रण में पहुंचते हैं. राजस्थान की सांभर झील और Keoladeo National Park,ओडिशा की Chilika Lake,आंध्र प्रदेश की कोलेरू झील,असम की दीपोर बील और काजीरंगा के मैदान,पंजाब-हरियाणा की हरिके पट्टन, उत्तर प्रदेश की संडी, नवाबगंज, लखबहोशी और समान सैंक्चुरी इन परिदों का बसेरा होता है.
कब लौटते हैं ये पक्षी?
फरवरी के आखिर से इनकी वापसी शुरू हो जाती है और जैसे ये आते हैं वापस लौट जाते हैं. सबसे पहले छोटे पक्षी लौटते हैं फिर मार्च में बतखें और गीज, अप्रैल के पहले हफ्ते में फ्लेमिंगो और सबसे आखिर में बार-हेडेड गूज.सितंबर से भरा भरा दिखने वाला भारत का आसमान अप्रैल के मध्य तक फिर से खाली होने लगता है. क्योंकि उसी समय उत्तर में साइबेरिया और आर्कटिक में बर्फ पिघलने लगती है, झीलें खुल जाती हैं, 24 घंटे दिन रहता है और भोजन की भरमार हो जाती है. वहीं इनके बच्चों का जन्म होता है, वही इनका असली घर है. जहां वो छुट्टी बिताने के बाद वापस लौट जाते हैं. प्रवासी पक्षियों की यह सालाना यात्रा सिर्फ एक प्राकृतिक घटना नहीं, बल्कि धरती, मौसम और जीवों के बीच बने संतुलन की अद्भुत मिसाल है. अगर भारत के वेटलैंड्स, झीलें और जंगल सुरक्षित रहे, तो यह परंपरा हजारों साल और चलती रहेगी. लेकिन अगर हमने प्रकृति से खिलवाड़ किया, तो आने वाली पीढ़ियां शायद इस चमत्कार को सिर्फ किताबों में ही पढ़ेंगी.