कांग्रेस की शीर्ष नीति-निर्धारक कमेटी CWC की बैठक इस बार पटना के सदाकत आश्रम में आयोजित हो रही है। यह बैठक केवल राजनीतिक मायनों में महत्वपूर्ण नहीं, बल्कि ऐतिहासिक दृष्टि से भी खास है। वजह है इस आश्रम की पृष्ठभूमि, जो स्वतंत्रता आंदोलन से गहराई से जुड़ी रही है।
सदाकत आश्रम की शुरुआत
सदाकत आश्रम की स्थापना साल 1921 में स्वतंत्रता सेनानी मौलाना मजहरुल हक ने की थी। उस दौर में यह जगह आज़ादी की लड़ाई का केंद्र बन गई थी। कई राष्ट्रीय नेता यहां बैठकर रणनीति बनाते थे। खास बात यह है कि आश्रम की जमीन खैरुं मियां नामक एक सहयोगी ने दान में दी थी, ताकि इसे स्वतंत्रता आंदोलन और सामाजिक कार्यों के लिए इस्तेमाल किया जा सके।
करीब 20 एकड़ में फैला यह आश्रम न केवल आंदोलन का गवाह बना, बल्कि आजादी के बाद भी इसका महत्व बरकरार रहा।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद से जुड़ी यादें
सदाकत आश्रम का महत्व और बढ़ जाता है क्योंकि भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने अपने अंतिम दिन यहीं बिताए थे। उनकी स्मृतियों को संजोने के लिए यहां राजेंद्र स्मृति संग्रहालय बनाया गया है, जहां उनके निजी सामान और आजादी से जुड़े दस्तावेज रखे गए हैं। यही वजह है कि यह स्थल केवल कांग्रेस ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए भावनात्मक महत्व रखता है।
कांग्रेस का मुख्यालय और वर्तमान भूमिका
आज यह आश्रम कांग्रेस का बिहार मुख्यालय है। यहां समय-समय पर पार्टी की अहम बैठकें होती रही हैं। अब जब CWC की बैठक यहां हो रही है, तो यह केवल राजनीतिक रणनीति बनाने का स्थान नहीं, बल्कि पार्टी के गौरवशाली इतिहास को याद करने का मौका भी है।
सदाकत आश्रम में होने वाली यह बैठक कांग्रेस के लिए प्रतीकात्मक महत्व भी रखती है। आज जब पार्टी अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रही है, तब ऐतिहासिक जमीन पर बैठकर फैसला लेना अपने आप में एक संदेश है।
पटना का सदाकत आश्रम केवल एक इमारत या दफ्तर नहीं, बल्कि आज़ादी की लड़ाई और लोकतांत्रिक मूल्यों की धरोहर है। खैरुं मियां के दान से शुरू हुई यह जगह आज भी कांग्रेस की राजनीति और देश की यादों को जोड़ती है। CWC की बैठक यहां आयोजित होना इस बात का प्रमाण है कि इतिहास और वर्तमान, दोनों एक ही मंच पर खड़े होकर भविष्य की दिशा तय कर सकते हैं।