कैसे हुआँ मां शैलपुत्री का जनम ओर क्यों की जाती है नवरात्रि के प्रथम दिन इनकी पूजा ?

 

नवरात्रि  नवरात्रि शुरू हो चुकी है और पहले ही दिन मंदिरों और घरों में भक्तों की भीड़ देखने को मिली. सुबह-सवेरे लोगों ने कलश स्थापना की और मां दुर्गा के पहले स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा की. हर तरफ भक्ति का माहौल रहा और शंख-घंटियों की आवाज से वातावरण गूंज उठा.

कौन हैं मां शैलपुत्री?

कहा जाता है कि मां शैलपुत्री पर्वतराज हिमालय की बेटी हैं. इसीलिए उनका नाम पड़ा “शैलपुत्री” यानी पर्वत की पुत्री. पुराणों में कथा है कि पिछले जन्म में वे सती थीं और भगवान शिव की पत्नी बनीं. लेकिन पिता दक्ष के यज्ञ में जब भगवान शिव का अपमान हुआ, तो सती ने अग्नि में कूदकर अपने प्राण दे दिए. इसके बाद वे हिमालय के घर जन्मीं और शैलपुत्री कहलाईं.

इनके एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे में कमल होता है. उनका वाहन बैल है, मां शैलपुत्री को शक्ति और साहस की देवी माना जाता है.

क्यों होती है पूजा पहले दिन?

नवरात्रि की शुरुआत मां शैलपुत्री की पूजा से इसलिए की जाती है क्योंकि वे शक्ति साधना का पहला रूप हैं. माना जाता है कि उनकी पूजा से मन स्थिर होता है और इंसान आगे की साधना और भक्ति के लिए तैयार हो जाता है.

कौन सा रंग पहनें और क्या भोग लगाएँ?

पहले दिन भक्त सफेद कपड़े पहनते हैं. सफेद रंग शांति और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है. महिलाएं सफेद साड़ी या सूट पहनती हैं और पुरुष सफेद कुर्ता पहनते हैं.

मां शैलपुत्री को शुद्ध घी का भोग लगाया जाता है. साथ ही खीर, रसगुल्ला और नारियल की बर्फी भी अर्पित की जाती है. मान्यता है कि इससे मां प्रसन्न होती हैं और भक्त को सेहत और लंबी उम्र का आशीर्वाद मिलता है.

मंदिरों में रौनक

दिल्ली, वाराणसी और कोलकाता जैसे शहरों में सुबह से ही मंदिरों में भक्तों की भीड़ लगी रही. जगह-जगह देवी के जयकारे सुनाई दिए. भक्त अपने परिवार की खुशहाली और जीवन में शांति की कामना कर रहे थे.

भक्तों का मानना है कि नवरात्रि का पहला दिन पूरे नौ दिनों की साधना की शुरुआत है

मां शैलपुत्री की पूजा से जो सकारात्मक ऊर्जा मिलती है, वही आगे के दिनों की भक्ति को मजबूत करती है.

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