भारत में ठीक नहीं हैं पुरुष और लड़के… हैरान करने वाला है मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जारी NCRB के आंकड़े

Mental health : भारत में पुरुषों (men) और लड़कों (boys) के मानसिक स्वास्थ्य संकट को अब अनदेखा नहीं किया जा सकता। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की हाल ही में जारी रिपोर्ट और शोध डेटा इस दिशा में एक चिंताजनक और तीव्र बढ़ते संकट की ओर इशारा करते हैं।NCRB के ताजा आंकड़े बताते हैं कि 2023 में भारत में कुल 1,71,418 आत्महत्या हुईं। इस संख्या में पारिवारिक समस्याएँ (31.9%) और बीमारी (19%) सबसे बड़े कारण हैं। अधिक परेशान करने वाली बात यह है कि अधिकांश आत्महत्याओं में पुरुषों का हिस्सा बहुत बड़ा है। रिपोर्टों के अनुसार लगभग 72% आत्महत्याएँ पुरुषों की हैं।एक अध्ययन के मुताबिक, पुरुषों का आत्महत्या दर महिलाओं की तुलना में 2.6 गुना अधिक है।

आर्थिक और सामाजिक दबाव

पुरुष आत्महत्याओं में नौकरी-से जुड़ा तनाव और कार्यस्थल पर मानसिक उत्पीड़न भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। उदाहरण के तौर पर, हरियाणा के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी (ADG) पूरन कुमार ने कथित मानसिक उत्पीड़न और काम के दवाब का हवाला देते हुए आत्महत्या की। दिल्ली के आंकड़े भी हतोत्साहित करने वाले हैं, 2023 में राष्ट्रीय राजधानी में 3,131 आत्महत्याएं हुईं, जिनमें से 2,295 पुरुष थे। आर्थिक पिछड़ापन भी एक बड़ा कारण है: NCRB रिपोर्ट में यह भी दिखाया गया है कि कई आत्महत्याओं में मारे गए लोगों की आय बहुत कम थी और वे बेरोज़गार या निचले आय वर्ग से थे।

मानसिक बीमारी के क्या है बड़े कारण

NCRB रिपोर्ट में बीमारी (illness) आत्महत्या का दूसरा सबसे बड़ा कारण है। Specifically, मानसिक बीमारियाँ (mental illnesses) आत्महत्या के कई मामलों में जिम्मेदार पाई गई हैं , 2023 में लगभग 13,978 आत्महत्याएँ मानसिक बीमारियों से जुड़ी थीं। और फिर यह अकेला आर्थिक या पारिवारिक तनाव नहीं है बल्कि स्वास्थ्य संबंधी लंबी बीमारी, जैसे कैंसर, भी आत्महत्या के कारण बनी हैं। मनोचिकित्सकों का कहना है कि पुरुषों को अपनी कमजोरियों को छिपाने की सामाजिक उम्मीदों (masculinity norms) से जूझना पड़ता है। कई मामलों में, वे अपनी भावनात्मक पीड़ा व्यक्त करने से डरते हैं क्योंकि समाज मजबूत बने रहने की अपेक्षा करता है। शोध और विश्लेषण यह भी दर्शाते हैं कि विवाहित पुरुषों में आत्महत्या की दर, महिलाओं की तुलना में कहीं अधिक है। एक अकादमिक पेपर में यह सुझाव दिया गया है कि कानूनी और सांस्कृतिक बदलाव लाकर पुरुषों के मानसिक स्वास्थ्य पर असर डाला जा सकता है, जैसे मनोवैज्ञानिक सहायता को कम कलंक के साथ पेश करना और मर्दानगी के हानिकारक स्टीरियोटाइप को चुनौती देना।

विशेषज्ञ दे रहे चेतावनी

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में मानसिक स्वास्थ्य दृष्टिकोण में जेंडर-संवेदनशीलता (gender sensitivity) की कमी है। पुरुषों की विशिष्ट जरूरतों को नज़रअंदाज़ किया जाता है, जिससे उनकी मदद मांगने की प्रवृत्ति कम होती है। उन्हें सुझाव दिया जा रहा है कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (primary healthcare) में चिकित्सक और फ्रंट-लाइन हेल्थ वर्कर्स को विशेष ट्रेनिंग दी जाए, ताकि वे बिना जजमेंट (निर्णय) के, गोपनीयता बनाए रखते हुए, पुरुषों से जुड़ सकें। इससे भी आगे, समुदाय स्तर पर पीयर सपोर्ट ग्रुप (peer-support groups) बनाना चाहिए, खासकर उन इलाकों में जहां स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच सीमित है। नीतिगत बदलाव भी अनिवार्य हैं, मानसिक स्वास्थ्य बजट में पुरुष मानसिक स्वास्थ्य को एक स्पष्ट प्राथमिकता दी जानी चाहिए। साथ ही, राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों में लिंग-इक्विटी (gender equity) का एक बेहतर ढांचा विकसित करने की जरूरत है।

भारत में पुरुषों और लड़कों के मानसिक स्वास्थ्य संकट को सिर्फ व्यक्तिगत कहानी के रूप में नहीं देखा जा सकता, यह एक राष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल (health emergency) बनता जा रहा है। NCRB के आंकड़े और अलग-अलग अध्ययन यह स्पष्ट करते हैं कि आत्महत्या की संख्या, सामाजिक और आर्थिक दबाव, और मानसिक बीमारियों का संयोजन एक जटिल लेकिन घातक स्थिति बना रहा है। समय की मांग है कि नीति निर्माता, सरकारी एजेंसियाँ, और नागरिक समुदाय मिलकर काम करें ताकि मर्दों की भी आवाज सुनी जाए, उन्हें सुरक्षित सहायता मिले, और मानसिक स्वास्थ्य को एक सामान्य जीवन-हक बनाया जाए।

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