बिहार : आपने बहुत से मंदिरों की कहानियां सुनी होंगी, जहां घंटियों की गूंज, शंख और भक्तों के भजन मिलकर अध्यात्मिक माहौल बनाते हैं। लेकिन क्या आपने कभी किसी ऐसे मंदिर के बारे में सुना है, जहां इंसानों के साथ-साथ कुत्ते भी भगवान की आरती गाते हों? जी हां, यह कोई कल्पना नहीं बल्कि हकीकत है। बिहार के बक्सर जिले के चरित्रवन स्थित श्मशान घाट परिसर में बने मां काली मंदिर में यह अद्भुत नजारा रोज़ देखने को मिलता है।
आरती शुरू होते ही जुट जाते हैं कुत्ते
मंदिर के पुजारी बताते हैं कि सुबह-शाम जब भी आरती की पहली घंटी बजती है, आसपास के श्मशान में रहने वाले कुत्ते स्वतः ही मंदिर की ओर चले आते हैं। दर्जनभर कुत्ते वहां जुटकर भक्तों के साथ सुर मिलाने लगते हैं। खास बात यह है कि ये खतरनाक माने जाने वाले कुत्ते किसी को नुकसान नहीं पहुंचाते। आरती खत्म होने के बाद भक्तजन उन्हें मिश्री खिलाते हैं और उसके बाद वे शांति से लौट जाते हैं।
सदियों पुरानी मान्यता
स्थानीय परंपरा के अनुसार यह मंदिर कई सौ साल पुराना है। कहा जाता है कि जब यहां पूजा-पाठ की शुरुआत हुई, तो कुत्ते स्वतः ही आरती में शामिल होने लगे। भक्तों का मानना है कि यह कोई संयोग नहीं, बल्कि भगवान का आशीर्वाद है।
- हिंदू परंपरा में कुत्ता भगवान भैरव का वाहन माना जाता है।
- यहां आने वाले कुत्तों को भैरव के दूत मानकर उन्हें भी प्रसाद चढ़ाया जाता है।
विशेष पूजा और भक्तों की आस्था
मां काली मंदिर में हर रविवार और मंगलवार को विशेष पूजा होती है, जिसे शिवाबली पूजा कहा जाता है। इसमें कई तरह के प्रसाद चढ़ाए जाते हैं और अंत में कुत्तों को भी भोग लगाया जाता है। भक्तों का विश्वास है कि यहां मन से की गई हर मुराद पूरी होती है। यही वजह है कि यहां इंसानों के साथ-साथ जानवरों में भी भगवान के प्रति अनोखी आस्था देखने को मिलती है।
भक्तों की नजर में चमत्कार
भक्तों का मानना है कि कुत्तों का आरती में शामिल होना इस बात का संकेत है कि ईश्वर हर प्राणी में वास करते हैं। चाहे वह इंसान हो या जानवर, हर कोई उनकी भक्ति में शामिल हो सकता है। जब मंदिर की घंटियों और भजनों के बीच कुत्तों की आवाज गूंजती है, तो लगता है मानो पूरी सृष्टि एक साथ भगवान की आराधना कर रही हो।