Carbon-negative country : दुनिया में जलवायु संकट गहराता जा रहा है, ऐसे समय में भारत का पड़ोसी देश भूटान एक ऐसी उपलब्धि हासिल कर चुका है जिसे बड़े-बड़े विकसित देश भी नहीं छू पाए हैं। भूटान दुनिया का पहला कार्बन-नेगेटिव देश है, यानी यह देश जितना कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित करता है, उससे कई गुना अधिक अपनी प्राकृतिक संपदाओं के माध्यम से सोख लेता है।
भूटान कैसे बना कार्बन-नेगेटिव देश?
भूटान के लगभग 72% हिस्से पर वन फैले हुए हैं। यह विशाल हरित क्षेत्र पूरे देश को एक बड़े कार्बन सिंक में बदल देता है। क्लाइमेट एक्शन ट्रैकर की रिपोर्ट के अनुसार, भूटान की नीतियां पेरिस समझौते के 1.5°C तापमान लक्ष्य के बेहद करीब हैं। दुनिया में शायद ही कोई देश हो जिसके संविधान में यह अनिवार्य हो कि देश का कम-से-कम 60% हिस्सा हमेशा जंगलों से ढका रहेगा। भूटान ने इसे कानून का हिस्सा बनाया है। कानून सरकार और नागरिक दोनों की यह जिम्मेदारी है कि वे वनों को सुरक्षित रखें, जैव विविधता बचाएं और पारिस्थितिक क्षरण को रोकें. भूटानी लोगों की आस्था और संस्कृति में प्रकृति का विशेष स्थान है। वे मानते हैं कि देवता पर्वतों, नदियों और जंगलों में निवास करते हैं, इसलिए प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा उनका धार्मिक कर्तव्य है। कई जल निकायों और जंगलों में अनावश्यक गतिविधियों और प्रदूषण पर प्रतिबंध है, वहीं कुछ पर्वतों पर चढ़ाई तक की अनुमति नहीं है।
विकास से पहले खुशी का मॉडल
भूटान की जनता प्रकृति से गहरे रूप से जुड़ी है। यहां विकास की प्राथमिकता GDP नहीं, बल्कि सकल राष्ट्रीय खुशी (Gross National Happiness – GNH) है। प्रधानमंत्री तोबगे के अनुसार, ब्रूट GDP बढ़ाना लक्ष्य नहीं है, बल्कि नागरिकों की खुशी, सामाजिक प्रगति, सांस्कृतिक संरक्षण और पर्यावरण सुरक्षा इन सभी को एक साथ आगे बढ़ाना असली विकास है। भूटान ने आर्थिक वृद्धि को कम किए बिना हवा, पानी और जमीन की गुणवत्ता को विश्व-स्तर पर बनाए रखा है।
5 गुना अधिक कार्बन अवशोषण
सरकार के अनुसार, भूटान जितना कार्बन उत्सर्जित करता है, उससे लगभग 5 गुना अधिक CO₂ सोख लेता है। यह उपलब्धि बेहद छोटी अर्थव्यवस्था वाले देश के लिए बड़ी मिसाल मानी जा रही है। जलवायु परिवर्तन का असर झेल रहा भूटान कार्बन-नेगेटिव होने के बावजूद भूटान जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव झेल रहा है। हिमालय की चोटियां तेजी से गर्म हो रही हैं. ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं.झीलों में उफान बढ़ रहा है.कई क्षेत्रों में बाढ़ का खतरा बढ़ा है. ग्रामीण किसान विस्थापित होने को मजबूर हैं. इसके अलावा, बाढ़ और भूस्खलन के कारण सड़क निर्माण और रख-रखाव की लागत भी बढ़ गई है।
भूटान मॉडल से दुनिया क्या सीख सकती है?
पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हो सकते हैं। राजनीतिक इच्छा शक्ति पर्यावरण नीति को सफल बनाने की सबसे बड़ी कुंजी है। संविधान-स्तर की पर्यावरणीय प्रतिबद्धता छोटे देशों को भी वैश्विक नेतृत्व दे सकती है। विकसित देश, जिन्होंने सबसे अधिक प्रदूषण फैलाया है, भूटान की तरह अपने मॉडल में सुधार ला सकते हैं। भूटान यह साबित करता है कि सीमित संसाधनों और छोटी अर्थव्यवस्था के बावजूद भी कोई देश विश्व के सामने जलवायु संरक्षण की सबसे बड़ी मिसाल बन सकता है।