Digital overstimulation : आज के इस डिजिटल दौर में अंग्रेजी का एक शब्द आपने अक्सर सुना होगा ,वन-गो. इसका मतलब है किसी किताब, फिल्म, वेब सीरीज या किसी भी डिजिटल कंटेंट को एक ही बार में पूरा खत्म कर देना. वेब सीरीज के लोकप्रिय होने के बाद यह शब्द आम बोलचाल का हिस्सा बन गया है. आप अकसर दोस्तों या सहकर्मियों से सुन लेंगे, मैंने वो सीरीज वन-गो में खत्म कर दी. लेकिन इस शब्द के पीछे एक बड़ा सवाल छिपा है, कि क्या हमें कंटेंट को जल्दी खत्म करने की आदत क्यों हो रही है?
कंटेंट की लंबाई क्यों घट रही है?
कभी लंबी कहानियां, उपन्यास और पत्रिकाएं पढ़ना एक सामान्य आदत थी. फिर रेडियो आया जहां हम 15 मिनट, 30 मिनट या 1 घंटे के कार्यक्रम के दिवाने बने थे. आज वही पैटर्न डिजिटल स्पेस में दिखाई देता है. वेब सीरीज छोटे एपिसोड में बंटी गई है. 2 घंटे की फिल्में 15–30 मिनट की रीकैप में बदल गई है. लेखों की जगह समरी और एक्सप्लेनर वीडियो का चलन बढ़ गया है,और 30 सेकंड, 1 मिनट का शॉर्ट कंटेंट पूरी दुनिया पर हावी है. शायद यह भी एक वजह है कि कंटेंट की अवधि घट रही है, और स्क्रीन टाइम बढ़ रहा है. और आदतन हम कम समय में ज्यादा कंटेंट देखने की कोशिश कर रहे हैं. आज ज्यादातर लोग वेब सीरीज, फिल्में या पॉडकास्ट 1.5x या 2x स्पीड पर देखने लगे हैं. क्रेडिट रोल शुरू होते ही स्किप बटन दबाना आदत बन चुकी है. हम कंटेंट को समझने के लिए नहीं, खत्म करने के लिए देखने लगे हैं. यानी कंटेंट छोटी होती गई और रफ्तार बढ़ती गई. इस रफ्तार ने एक बड़ी समस्या भी पैदा की जल्दबाजी में कई बार अधूरी, संदिग्ध या गलत खबरें भी सामने आने लगीं.
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शॉर्ट कंटेंट बनाम लॉन्ग फॉर्म किससे असल खतरा क्या है?
अब देखें तो हमारे पास आज दो तरह के कंटेंट मौजूद हैं. पहला है शॉर्ट, तेज, तात्कालिक कंटेंट जिसमें 15 सेकंड का रील, 30 सेकंड का वीडियो, 1 मिनट की एक्सप्लेनेशन और 200 शब्दों की समरी वाले कंटेंट आते हैं, तो दूसरा है लंबा, गहन, शोध आधारित कंटेंट जिसमें डॉक्यूमेंट्री,लंबी वेब सीरीज,फीचर आर्टिकल और किताबें हैं. समस्या यह है कि शॉर्ट कंटेंट त्वरित है, लेकिन अधूरा होता है तो वहीं लंबा कंटेंट गहरा है, लेकिन समय मांगता है. नतीजा ज्यादातर लोग समय बचाने के चक्कर में अक्सर अधूरी जानकारी पर भरोसा कर लेते हैं. जिससे अर्थ का अनर्थ होने का खतरा बढ़ जाता है.
क्या यह बदलाव सकारात्मक है या नकारात्मक?
अब इसका सकारात्मक पहलू देखें तो हमारे पास विकल्पों की आजादी, अपने हिसाब से कंटेंट देखने की सुविधा, किसी भी विषय तक तुरंत पहुंच और समय की बचत जैसे तर्क है लेकिन इसके साथ नकारात्मक पहलू भी है जिसके कारण ध्यान का समय (Attention Span) घट रहा, गहन समझ कमजोर हो रही गलत/अधूरी जानकारी का खतरा रहता है. कुल मिलाकर डिजिटल दुनिया में कंटेंट विकल्पों का सागर है. लेकिन विकल्पों की अधिकता ही आज सबसे बड़ा संकट भी है. हम किस कंटेंट पर भरोसा करें? क्या हम आधी-अधूरी बातों पर आधारित दुनिया नहीं बना रहे? कंटेंट कंज्यूमर, क्रिएटर और प्रकाशक तीनों की क्या जिम्मेदारी है? इन सवालों पर गंभीरता से सोचने की ज़रूरत है, क्योंकि आज सूचना की तेज रफ्तार कई बार उसकी सच्चाई से भी तेज हो जाती है.