Ruktapur Book review : कहानियों से रूबरू होने का शौक है, मगर शर्त ये रखता हूँ कहानी छोटी होनी चाहिए। मेरा अपना मानना है बड़ी कहानियों में किरदार खत्म कर दिए जाते है। खैर अभी इन बातों का वक्त नहीं है। ” तुलना” शब्द से अपनी कभी नहीं बनी क्योंकि ये बड़े और छोटे में फर्क करना सिखाता है। लेकिन शब्द ने कभी पीछा नहीं छोड़ा और मैंने भी रिश्ता बनाए रखा। ये रिश्ता है सीखने का। बिहार से हूँ, राज्य से लगाव है,वैसा ही लगाव जैसा किसी का अपने मातृभूमि से होता है । देश भर में मेरे गृह प्रदेश को लेकर कई सारी दंतकथाएं प्रचलित है। इसमें एक बात जो चुभती है वो हैं राज्य को बीमारू राज्य होने की उमपा देना। लेकिन काफी हद तक इसमें सच्चाई भी है तो कभी शब्दों को ताकत नहीं मिली जिससे इसका विरोध किया जा सके।
अपने आस-पड़ोस की दशा को देखते हुए इतना यकीन था की बिहार की जो तस्वीर बताई जा रही है वो वास्तव में उतना ही सही नहीं है। इसमें काफी मात्रा में झूठ के रंगों का प्रयोग भी किया गया है। सफेद पन्नों पर सूखें रंगों का निखार अच्छा नहीं लगता, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सफेद इसलिए सफेद होता है क्योंकि दूसरे रंग उसपर झलक जाते हैं। बिहार के किस्सों में ये बिहार को सफेद माने तो राजनीति एवं सामाजिक और आर्थिक परिस्थिति उन रंगों की तरह है जो हमेशा झलकते रहते हैं। जो बिहार को बीमारू राज्य का तमगा देती है। हैरान करने वाली बात ये हैं कि राज्य को यह खिताब देने वाले इस बात कि जानकारी नहीं रखते आखिर राज्य को बीमारू होने का तमगा क्यों दिया जा रहा है ? ज्यादा पूछने पर पिछले 30 साल की राजनीति की दुहाई देने के अलावा उनके पास कुछ और होता नहीं है।
राज्य के बीमारू होने के कारकों की तलाश में इस भटकते रिपोर्टर की किताब से रूबरू हुआ। किसी पुल की एक तस्वीर है, जो अधूरा है। पुल के एक हिस्से की सड़क गायब है। यह तस्वीर इस किताब की कवर है, जिसपर लिखा हुआ है ” रुकतापुर “। शब्दकोश में भले ही यह इस शब्द का कोई ठीक ठीक अर्थ न मिले लेकिन बिहार के लिए यह शब्द विकास का पर्याय है। कई कहानी और किरदारों की इस किस्सा संग्रह ( कई मुद्दे जो बिहार के विकास में बाधक है उन्हें अलग अलग किरदारों के कहानी के जरिए बताया गया है) में आपको बिहार से रूबरू होने का भरपूर मौका मिलता है। जैसा की मुझे मिला। कई चीजों को सीखने का मौका मिलता है। तो कई ऐसे चीजें हैं जिसे जानकर आप हैरान रह जाएंगे। आप एक बार लेखक के कहानी बूनने के तरीकों पर सवाल भी कर सकते हैं लेकिन इसकी भी पूरी संभावना है कि यह कहानी आपकी आप बीती हो। अगर इस राज्य से नहीं है तो आपको यह अहसास भी होगा, दरअसल लोग एक जैसे ही होते, उनके मुद्दे एक जैसे होते है और उनकी तकलीफ और खुशियां भी एक जैसे ही होते है। 10 अध्याय के इस किताब ने अपने जिल्द में कई कहानीयों को समेटे रखा है। जो बिहार से रूबरू करवाते हैं।
एक रिपोर्टर जो भटकती कहानी में किरदार ढूँढ रहा है वो अपनी बारीक नज़रों से बताता है बिहार के विकास में रोड़ा क्या है ? आखिरी जब लोग खुद के शिक्षित होने का दंभ भरते है फिर यहाँ विकास के अन्य मुद्दों पर जातीवाद, संप्रदायवाद, क्षेत्रवाद, आदि क्यों हावी है ? लगभग 30 साल की राजनीति में सामाजिक, संस्कृतिक, आर्थिक आदि बर्बरता के बाद भी आज आम नागरिक उन्हीं विवशताओं से घिरा क्यों है। विकास के मुद्दे पर नागरिकों के लिए राज्य और केंद्र के व्यवहार में विषमता क्यों है? महिलाएं क्यों परेशान है ? पुरुषों की क्या समस्याएं है ? बेरोजगारी क्यों है ? रोजगार के अवसर क्यों नहीं है ? उद्योग विकसित क्यों नहीं किये जा रहे ? तो पहले से मौजूद उद्योग बंद क्यों हो रहें ? स्वास्थ सुविधाओं के नाम पर सरकार विफल क्यों है ? आदि जब हम आज देश की आजादी के 75वें साल में प्रवेश कर अमृत महोत्सव मना रहे हैं । इस प्रदेश के लिए रोटी, कपड़ा,मकान, स्वास्थ, रोजगार आदि बेसिक जरूरत समस्या क्यों हैं ? ऐसे कई सवालों के जबाव के लिए यह एक मुकम्मल किताब है। 2020 में जब यह किताब आई थी उसके बाद से आज जब मैंने यह किताब पढ़ी, 4 साल बीत चुकें है। लेकिन बिहार और बिहार की समस्या जस का तस है। अगर कहूँ कि बिहार और भी पिछड़ गया है तो शायद अतिशयोक्ति ना हो।
Ruktapur ने मुझे अपने बिहार से मिलाया और वास्तविक तस्वीर से रूबरू कराया। शब्दों के लिए लेखक का धन्यबाद और किताब के लिए प्रशासक का आभार।