अंधविश्वास या आस्था ; धार्मिक आयोजनों और सत्संग जैसे कार्यक्रमों में सैकड़ों की मौत

Hathras Baghdad Hadsa : चरण रज लेने की होड़ ने उत्तरप्रदेश के हाथरस में 100 से अधिक लोगों को जान ले ली। अभी तक मिली जानकारी के अनुसार हाथरस में भोले बाबा के सत्संग के बाद मंगलवार दोपहर करीब एक बजे पूरे प्रदेश भर के करीब 121 लोगों की दर्दनाक मौत हो गई। घटना की भयावह का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि घटना के बाद शवों और घायलों को बसों और वैन में भरकर सिकंदराराऊ सीएचसी, एटा जिला अस्पताल और अलीगढ़ मेडिकल कॉलेज ले जाया गया। अस्पतालों में इतनी मात्रा में एक साथ पहुंचे शवों के कारण अफरा-तफरी मच गई। अस्पतालों में बेड की कमी पड़ गई, तो मृतकों के बदन को ढकने को कफन तक नहीं उपलब्ध करा सकी। हादसे में मौत के बाद मृतकों के शव रातभर पोस्टमार्टम के इंतजार में जमीन पर पड़े रहे। अभी तक मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार कुल मृतकों की संख्या 121 हो गई है। लेकिन यह पहला घटना नहीं है जब धार्मिक आयोजनों या सत्संग जैसे कार्यक्रमों में भगदड़ मचने के बाद इतने संख्या में लोग मारे गए हैं।

आखिर हाथरस में ऐसा क्या हुआ जो मौत का कारण बनी ?

धर्मगुरुओं का ऐसे गोरख धंधे जहां सत्संग के नाम पर मौत परोसी जाती है इसके लिए जिम्मेदार कौन हैं ? कब तक अंधआस्था, अंधविश्वास और अव्यवस्था के मौत को हम लापरवाही का नाम देते रहेंगे ? घायलों को समय पर सुविधा क्यों नहीं मिली ? अगर समय पर डॉक्टर मिल गया होता, दवा मिल गया होता, ऑक्सीजन मिल गया होता, एंबुलेंस मिल गया होता तो लोगों की जाने बचाई जा सकती थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ क्योंकि जिले में ना स्वास्थ सुविधाएं उपलब्ध थी और ना ही घटना के बाद भी सुविधाएं उपलब्ध कराई गई। जिसका नतीजा हुआ कि सिर्फ नियम और कानून व्यवस्था के जरिए जिस घटना को घटित होने से रोका जा सकता था सरकारी सिस्टम की अव्यवस्था ने उसे जमीन पर उतार दिया। हाथरस की यह घटना नई नहीं है।

अंधआस्था : आंड़बर और अव्यवस्था

सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर कब तक लोग अंधआस्था और अव्यवस्था के कारण अपनी जान गँवाते रहेंगे ? हादसे के बाद मुवाजों पर खर्च होने वाले राशि अगर सरकार व्यवस्थाओं पर खर्च करें तो परिणाम शायद अलग हो ? हालात भी ऐसे ही संकेत करते है। हाथरस हादसे में अपनी जान गवाने वालों लोगों को बचाया जा सकता था लेकिन अव्यवस्था ने उन मासूमों की जान ले ली। अस्पताल के बाहर रात भर परिसर में पड़ी शवों की खामोश चीत्कार चीख चीख कर सिस्टम को दुहाई दे रही थी और पूछ रही थी आखिर हमारे अंधविश्वास की इतनी बड़ी सजा क्यों ? क्योंकि मेरे इस गुनाह में ये सिस्टम भी तो शामिल शामिल था। आम लोगों की सुविधा के नाम पर सत्संग परिसर से लेकर से अस्पताल के परिसर तक व्यवस्था के नाम पर सिर्फ और सिर्फ आंड़बर जो सरकार के विकास की पोल खोल रही थी। सवालों में समझो तो क्या करीब 2 लाख लोगों के सुरक्षा के लिए महज 40 लोग पर्याप्त थे ? क्या सत्संग स्थल व्यवस्थित था ? नहीं तो किसकी जिम्मेदारी थी ? बेहतर स्वास्थ के लिए खुद का पीठ थपथपाती सरकारी सीस्टम के पास एक जिले में 1000 लोगों के इलाज के लिए भी जगह नहीं है ? एंबुलेंस, ऑक्सीजन, दवा और स्वास्थ की अन्य सुविधा जिससे घायलों को बचाया जा सकता है उपलब्ध क्यों नहीं थे ? कुल मिलाकर अंधआस्था ने इन धर्मगुरुओं के आंड़बर और सरकार की अव्यवस्था के कारण मौत का अंबार लगा दिया।

जब भगदड़ बनी मौत का काल

  • आंध्र प्रदेश के राजमुंदरी में 14 जुलाई, 2015 को पुष्करम त्योहार के दौरान गोदावरी नदी में स्नान को पहुंचने हजारों लोग घाट पर मची भगदड़ का हिस्सा हो गए। इस दौरान 27 लोगों की मौत और 20 अन्य घायल हो गए।
  • जनवरी 2022 को जम्मू और कश्मीर के माता वैष्णो देवी मंदिर में मची भगदड़ से 12 लोगों की मौत हो गई जबकि 16 घायल भी हुए। यह हादसा 1 जनवरी को हुई थी।
  • 2023 में इंदौर में रामनवमी के अवसर पर एक प्राचीन बावड़ी के ऊपर लगाए गए पत्थर के स्लैब टूट गया। जिससे मची भगदड़ के कारण 36 लोगों की मौत हो गई।
  • 3 अक्टूबर 2014 को पटना के गांधी मैदान में दशहरा उत्सव के बाद मची भगदड़ में करीब 32 लोगों की मौत हो गई और 100 अन्य घायल हो गए थे।
  • मध्य प्रदेश के दतिया जिले में 13 अक्टूबर 2013 को रत्नागिरी मंदिर में नवरात्रि के दौरान परिसर में जमा श्रद्धालुओं में भगदड़ मच गई जिसके बाद अफरातफरी के दौरान लोग गिरने लगे इस घटना में 115 लोग कुचल कर मारे गए जबकि 100 से ज्यादा लोग घायल हो गए। घटना को लेकर कहा गया कि श्रद्धालुओं के बीच अफवाह फैल गई रास्ते में मौजूद पुल गिर गया है। जिसके बाद लोग घबरा गए और इधर-उधर भागने के चलते घटना हुई।
  • पटना में छठ पूजा के लिए गंगा किनारे बने अदालत घाट में बना एक अस्थायी पुल 19 नवंबर 2012 को टूट गया। पुल टूटने के बाद भगदड़ मच गई और इसमें 20 लोगों की मौत हो गई। इस हादसे में कई लोग घायल हुए।
  • 8 नवंबर 2011 को हरिद्वार में हर की पौड़ी में घाट पर मची भगदड़ में 20 लोगों की मौत हो गई।
  • केरल के इदुक्की जिले में पुलमेदु के पास सबरीमाला से वापस जा रहे श्रद्धालुओं को एक जीप ने टक्कर मार दी। 14 जनवरी 2011 घटित इस घटना के बाद श्रद्धालुओं में भगदड़ मच गई जिससे 104 लोगों की मृत्यु हो गई तो हादसे में 40 से ज्यादा लोग घायल हुए थे।
  • उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ में कृपालु महाराज के रामजानकी मंदिर में 4 मार्च 2010 को नि:शुल्क बांटे जा रहे कपड़े और खाना लेने के लिए जमा हुई भीड़ अनियंत्रित हो गई जिसके बाद मची भगदड़ में कम से कम 63 लोगों की कुचल कर मौत हो गई।
  • राजस्थान के जोधपुर शहर के चामुंडा देवी मंदिर में बम होने की अफवाह उड़ी। अफवाह के बाद श्रद्धालुओं में भगदड़ मच गई और 30 सितंबर, 2008 को हुए इस हादसे में 224 लोग मारे गए और 425 से से अधिक लोग घायल हो गए।
  • हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले में 3 अगस्त 2008 को नैना देवी पहाड़ से पत्थर गिरने की अफवाह फैली और लोग बुरी तरह घबरा गए। घटना के बाद भगदड़ मच गई और इसमें 162 लोगों की मौत हो गई और 47 लोग घायल हो गए।
  • 27 अगस्त 2003 को महाराष्ट्र के नासिक जिले में कुंभ मेले के दौरान मची भगदड़ में 39 लोगों की मौत हो गई घटना में लगभग 140 लोग घायल हो गए थे।
  • 2005 में महाराष्ट्र में सतारा के मांढरदेवी मची भगदड़ में करीब 340 लोगों की मौत हो गई।
  • 2008 में राजस्थान के चामुंडा देवी मंदिर में भगदड़ के दौरान 250 लोगों की मौत हुई थी।
  • 2008 में ही हिमाचल प्रदेश के नैना देवी मंदिर में भगदड़ हादसे में 162 लोगों की मौत हो गई थी।

Note : ये आँकड़े मीडिया रिपोर्ट्स के है इसलिए इसमें कमी और बढ़ोतरी की थोड़ी बहुत गुंजाइश हो सकती है।

झूठे धर्मगुरुओं के आडंबर के पीछे लोकआस्था 

यह देश और इसकी संस्कृति ऐसी है कि अयोध्या में दीपोत्सव के नाम पर लाखों लोगों की भीड़ जमा हो जाती है, मौनी अमावस्या पर करोड़ों लोग एक साथ गंगा में डुबकी लगाने पहुँच जाते है, तो जिस कुंभ मेले को यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के रूप में स्वीकार किया है उसमें महीने भर में कई करोड़ लोग स्नान को जाते है। आदि कई ऐसे छोटी बड़ी मान्यताओं के प्रति लोगों की आस्था है। ऐसे में जिस देश के लोगों की आस्था इतनी संवेदनशील हो वहाँ इस तरह के धार्मिक आयोजनों या सत्संग में मजबूत व्यवस्था सरकार की जिम्मेदारी हैं। जिसमें सरकार गैरजिम्मेदार रही है। पिछले आँकड़े बताते है कि इस देश में आस्था व्यवस्थाओं पर हमेशा भारी पड़ी है। कमजोर और खराब व्यवस्था के प्रति सिर्फ सरकार को जिम्मेदार ठहराना भी सही नहीं है। क्योंकि अगर झूठे धर्मगुरुओं के दिखावटी आडंबर के पीछे लोग आस्था और अंधविश्वास में जब तक अंतर को नहीं पहचानेगें, ऐसे हादसों को रोकना मुश्किल होता जाएगा।

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