भागलपुरी रेशम की चमक से रोशन हुआ बिहार का नाम दुनिया भर में बढ़ी सिल्क सिटी की पहचान

Bhagalpuri silk : बिहार का भागलपुर शहर भारत ही नहीं , बल्कि पुरे विश्व में ‘ सिल्क सिटी ‘ के नाम से जाना जाता है। यहाँ की भागलपुरी रेशम साड़ियाँ अपने शानदार बुनाई , प्रकृति चमक और पारम्परिक डिजाईनो के लिए मशहूर है। सादगी और शालीनता का प्रतिक यह साड़ियाँ आज फैशन की दुनिया में अपनी खास जगह बना चुकी है।

भागलपुरी रेशम का इतिहास: दो हजार साल पुरानी परंपरा

भागलपुरी रेशम का इतिहास करीब दो सौ साल पुराना बताया जाता है। माना जाता है कि मुग़ल काल में इस क्षेत्र के बुनकरों ने तसर रेशम से साड़ियाँ बनाना शुरू किया था। धीरे – धीरे इसकी प्रसिद्धि इतनी बढ़ी की ब्रिटिश काल में भी भागलपुर से रेशमी कपड़ो का निर्यात यूरोप और एशिया के कई देशो देशों में किया जाने लगा। आज भी यहाँ हज़ारो बुनकर बुनकर परिवार इस परंपरा को अपने हाथो से संजोए हुए है और इसे नई पहचान दे रहे है।

 कैसे बनती है भागलपुरी रेशम साड़ी?

भागलपुरी रेशम साड़ी की खासियत इसकी बुनाई में छिपी है। यह साड़ी तसर सिल्क से बनाई जाती है , जो साल , अर्जुन और साजा जैसे पेड़ो पर पलने वाले कीड़ो के कोकून से तैयार किया जाता है। इस रेशम में प्राकृतिक गोल्डन टेक्सचर और हल्की चमक होती है , जो इसे खास बनाती है। बुनाई की प्रक्रिया पूरी तरह हस्तनिर्मित होती है जिसमे कोकून से धागा निकालने , रंगाई करने और करघे पर बुनाई जैसे कई चरण शामिल होते है। भागलपुर में करीब 30 ,000 से अधिक बुनकर इस काल से जुड़े हुए है।

कांथा कढ़ाई: साड़ी को देती है बंगाली सौंदर्य की झलक

भागलपुरी रेशम साड़ियों में कांथा कढ़ाई की सुंदरता भी देखने लायक होती है। यह कढ़ाई बिहार और पश्चिम बंगाल की पारंपरिक लोककला है जिसमें सुई और धागे से बारीक डिज़ाइन बनाए जाते हैं। कांथा कढ़ाई से सजी साड़ियाँ फूलों, बेल-बूटों और लोककथाओं की झलक दिखाती हैं, जो हर साड़ी को एक अनोखा रूप देती है।

अंतरराष्ट्रीय पहचान

भागलपुरी रेशम की ख्याति सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी फैल चुकी है। अमेरिका, जापान, इटली, फ्रांस और ब्रिटेन जैसे देशों में इसकी भारी मांग है। इसे भारत सरकार द्वारा “Geographical Indication (GI) Tag” भी दिया गया है, जिससे इसकी अंतरराष्ट्रीय पहचान और भी मजबूत हुई है।

फैशन की दुनिया में भागलपुरी रेशम

आज के समय में भागलपुरी रेशम सिर्फ साड़ियों तक सीमित नहीं रह गया है। इससे अब कुर्ते, स्कार्फ, स्टोल, जैकेट और इंडो-वेस्टर्न ड्रेसेज़ भी तैयार की जा रही हैं। कई नामी फैशन डिजाइनर भी अपने कलेक्शन में भागलपुरी रेशम को शामिल कर रहे हैं, जिससे यह युवाओं के बीच भी लोकप्रिय हो गया है।

सरकार और स्थानीय पहल

राज्य सरकार और स्थानीय संगठनों ने बुनकरों की मदद के लिए कई योजनाएँ शुरू की हैं। हैंडलूम क्लस्टर प्रोजेक्ट, सिल्क टेक्सटाइल पार्क और प्रशिक्षण केंद्रों के माध्यम से बुनाई कला को आधुनिक तकनीक से जोड़ा जा रहा है, जिससे रोजगार और उत्पादन दोनों में वृद्धि हुई है।

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