INDIA bloc unity : एक के बाद एक राज्यों के विधानसभा चुनावों में भाजपा की सफलता कांग्रेस के लिए नई राजनीतिक संभावनाओं के संकेत दे रही है. हालांकि इसमें पूरी सच्चाई है कि भारतीय राजनीति के दो राष्ट्रीय दलों कांग्रेस और भाजपा के बीच मौजूदा समय में अंतर बड़ा है, एक ओर जहां भाजपा सत्ता के शिखर पर है, वहीं कांग्रेस अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रही है. दिल्ली, महाराष्ट्र, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में क्षेत्रीय दलों के प्रदर्शन में आई गिरावट और ठीक उसी समय में कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा सरकार की नीतियों और भाजपा के खिलाफ लगातार चलाए जा रहे राजनीतिक अभियान को लेकर विपक्षी राजनीति में जो माहौल बना है, उसे कांग्रेस अपने पुनरुत्थान के अवसर के रूप में देख सकती है. उधर क्षेत्रीय दलों का कांग्रेस के साथ उनके संबंधों और भविष्य की रणनीति को लेकर इन दिनों राजनीतिक हलकों में जो चर्चाएं हो रही है वो विपक्ष की राजनीति में एक नए बदलाव का संकेत जान पड़ता है. विपक्षी एकता और सामाजिक मुद्दों को केंद्र में रखकर कांग्रेस ने जिस तरह अपनी भूमिका मजबूत करने की कोशिश की है, उसका असर आगामी राजनीतिक समीकरणों पर पड़ सकता है. राजनीतिक विश्लेषकों का भी मानना है कि अगर क्षेत्रीय दलों का प्रभाव सीमित होता है और कांग्रेस अपने संगठन को मजबूत करने में सफल रहती है, तो राष्ट्रीय राजनीति में उसका स्थान फिर से मजबूत हो सकता है.
क्यों हो रही घर वापसी की चर्चा
दरअसल इन अटकलों को हवा तब मिली जब हाल के राजनीतिक घटनाक्रमों ने न सिर्फ विपक्षी गठबंधन की स्थिरता पर सवाल खड़े किए हैं बल्कि क्षेत्रीय दलों के भीतर संगठनात्मक चुनौतियां और नेतृत्व को लेकर भी असंतोष सामने आया है. महाराष्ट्र में शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) को लेकर अटकलें तब तेज हुई,जब पार्टी की बैठकों में सांसदों की अनुपस्थिति ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चाओं को जन्म दिया. इसी तरह महाराष्ट्र की ही राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में भी भविष्य की रणनीति को लेकर मंथन की खबरें आई और पश्चिम बंगाल की राजनीति में लंबे समय से प्रभावशाली रही ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस चुनावी हार के कारण ऐसी बिखरी कि पार्टी की राजनीतिक अस्तित्व ही खतरे में पड गया है. इन सबके बीच एक बार फिर से विपक्षी खेमा का एकजुट होने की कवायद और गिले शिकवे दूर करने की कोशिश राजनीतिक हलकों में यह सवाल उठा रहा है कि क्या कभी कांग्रेस से अलग होकर अपनी पहचान बनाने वाले ये नेता और दल भविष्य में कांग्रेस के साथ किसी बड़े राजनीतिक पुनर्गठन का हिस्सा बन सकते हैं.हालांकि किसी बड़े विलय या बदलाव की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है.
पुराने सहयोगियों के साथ संबंधों को मजबूत करने की कोशिश
विपक्षी एकता को मजबूत करने के प्रयासों के बीच कांग्रेस नेतृत्व ने पुराने सहयोगियों के साथ संबंधों को फिर से मजबूत करने की कोशिश शुरू की है. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अशोक गहलोत हों,ममता बनर्जी हों या फिर महाराष्ट्र से जुड़े दूसरे बड़े नेताओं ने भी पुराने राजनीतिक रिश्तों को फिर से देखने की जरूरत पर जोर दिया है. इन चर्चाओं के बीच राजनीतिक विश्लेषकों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि ऐसा कोई कदम होता है तो उसका स्वरूप क्या होगा. 1998 में कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस बनाने वाली ममता बनर्जी हो या फिर 1999 में कांग्रेस से अलग होकर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की स्थापना करने वाले शरद पवार, दोनों ही नेताओं ने अपने-अपने राज्यों में कांग्रेस के विकल्प के रूप में राजनीतिक आधार तैयार कर अपनी पहचान बनाई है, ऐसे में दो दशक से अधिक समय बाद वापसी या विलय जैसी संभावना राजनीतिक रूप से कितनी आसान नहीं होगी. चुकी राजनीति ही है और मान लिया जाए कि अगर कभी विलय या गहरे गठबंधन की स्थिति बनती है तो सबसे बड़ी चुनौती नेतृत्व व्यवस्था और कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल की होगी. सवाल यह होगा कि क्या क्षेत्रीय दलों के नेता कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व के अंदर काम करने को तैयार होंगे और क्या कांग्रेस नेतृत्व उन्हें अपने राज्यों में स्वतंत्र राजनीतिक फैसले लेने के लिए पर्याप्त जगह देगी ?
कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के बीच हो सकेगा राजनीतिक समन्वय
हालांकि एक सच तो ये भी है कि कांग्रेस से अलग हुए कुछ दलों में आज भी वैचारिक समानता दिखाई देती है. आंध्र प्रदेश की वाईएसआर कांग्रेस पार्टी भी कांग्रेस से अलग हुई राजनीतिक धारा से निकली थी. वहीं जनता दल परंपरा के कुछ दलों में भी कांग्रेस जैसी धर्मनिरपेक्ष और कल्याणकारी राजनीति की झलक देखी जाती है. हालांकि शिवसेना, समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल जैसे दलों की राजनीतिक पहचान अलग सामाजिक और वैचारिक आधारों पर बनी है. ऐसे में राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि पूर्ण विलय की संभावना भले ही सीमित हो, लेकिन कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के बीच अधिक मजबूत समन्वय भविष्य की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. और आने वाले समय में विपक्षी राजनीति का स्वरूप इस बात पर निर्भर करेगा कि क्षेत्रीय दल अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखते हुए कांग्रेस के साथ कितना तालमेल बैठा पाते हैं.