केरल में हार से खत्म हो जाएगा भारत में वामपंथ..! जानिए उभार और पतन की पूरी कहानी

Left politics in India : भारत के राजनीतिक इतिहास में एक समय ऐसा भी था जब वामपंथी दल राष्ट्रीय राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाते थे. लेकिन हालिया केरल विधानसभा चुनाव के नतीजों ने इस धारणा को गहरा झटका दिया है. देश के आखिरी मजबूत वामपंथी गढ़ माने जाने वाले केरल में लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) की हार को सिर्फ एक चुनावी परिणाम नहीं, बल्कि एक विचारधारा के कमजोर पड़ने के संकेत के रूप में देखा जा रहा है.

केरल में सत्ता परिवर्तन

140 सदस्यीय विधानसभा के लिए हुए चुनाव में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) ने स्पष्ट बढ़त हासिल कर LDF को सत्ता से बाहर कर दिया. पिछले 10 वर्षों से पिनराई विजयन के नेतृत्व में चल रही सरकार को जनता ने इस बार नकार दिया. LDF गठबंधन में Communist Party of India (Marxist), Communist Party of India, जनता दल (सेक्युलर), एनसीपी समेत कई दल शामिल थे. इसके बावजूद एंटी-इनकंबेंसी और बदलाव की चाह ने चुनावी समीकरण बदल दिए.

वामपंथ का ऐतिहासिक सफर

भारत में कम्युनिस्ट विचारधारा की शुरुआत 1925 में एम.एन. रॉय जैसे नेताओं के प्रयासों से हुई, जब Communist Party of India की स्थापना हुई. शुरुआती दौर में यह आंदोलन मजदूरों और किसानों के अधिकारों पर केंद्रित था. आजादी के बाद पार्टी ने पहले सशस्त्र संघर्ष का रास्ता अपनाया, लेकिन असफलता के बाद लोकतांत्रिक राजनीति में भागीदारी शुरू की. इसका सबसे बड़ा उदाहरण 1957 में देखने को मिला, जब ई.एम.एस. नंबूदरीपाद के नेतृत्व में केरल में दुनिया की पहली लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई कम्युनिस्ट सरकार बनी. हालांकि 1964 में विचारधारात्मक मतभेदों के चलते पार्टी CPI और CPI(M) दो हिस्सों में बंट गई. जहां CPI सोवियत संघ की नीतियों के करीब रही, वहीं CPI(M) ने अधिक क्रांतिकारी रुख अपनाया.

राजनीति में उभार और पतन

पश्चिम बंगाल में 1977 से 2011 तक लगातार 34 वर्षों तक वाम मोर्चा सत्ता में रहा. ज्योति बसु और बाद में बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व में शासन चला. लेकिन सिंगूर और नंदीग्राम जैसे भूमि विवादों ने जनता का भरोसा तोड़ दिया. 2011 में ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस ने ऐतिहासिक जीत दर्ज कर वाम शासन का अंत कर दिया. इसी तरह त्रिपुरा में भी करीब 25 वर्षों तक शासन करने के बाद 2018 में मानिक सरकार की सरकार को भाजपा ने हरा दिया. इतना ही नहीं राष्ट्रीय राजनीति में 2004 में वाम दल अपने चरम पर थे, जब उन्होंने मनमोहन सिंह की सरकार को बाहर से समर्थन दिया और मनरेगा व RTI जैसे कानूनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. लेकिन आज लोकसभा में उनकी संख्या घटकर सिर्फ कुछ सीटों तक सीमित रह गई है.

केरल मॉडल की उपलब्धियां

केरल में वामपंथी सरकारों ने शिक्षा और स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान दिया. राज्य का साक्षरता दर लगभग 95% है और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली देश में सबसे बेहतर मानी जाती है. भूमि सुधारों ने सामाजिक असमानता को कम करने में मदद की. हालांकि, औद्योगिक विकास की कमी और सीमित रोजगार अवसर इस मॉडल की बड़ी कमजोरियां रहीं. जिसके कारण अब वाम मोर्चा का यह किला भी ढ़ह गया. ऐसे में केरल में हार के बाद यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या भारत में वामपंथी राजनीति का पुनरुत्थान संभव है या यह उसके पतन का संकेत है. फिलहाल इतना स्पष्ट है कि वाम दलों का प्रभाव अब सीमित होता जा रहा है, और उन्हें नए राजनीतिक व सामाजिक समीकरणों के अनुसार खुद को ढालना होगा.

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