राजनीति में पारिवारिक विरासत का एक और उदाहरण…निशांत कुमार के लिए अवसर तो चुनौती भी है मंत्री पद ?

Nishant kumar : बंगाल में जीत के बाद बिहार में एनडीए सरकार मंत्रीमंडल विस्तार के साथ शक्ति प्रदर्शन करने जा रही. 7 मई को पटना के गांधी मैदान में शपथ ग्रहण कार्यक्रम होगा. लेकिन उससे पहले बिहार की सियासत में निशांत कुमार का नाम तेजी से चर्चा में है. खबरों और राजनीतिक गलियारों में अटकलें तेज हैं कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पुत्र निशांत को मंत्री पद दिया जा सकता है. यदि ऐसा होता है, तो यह उनके राजनीतिक करियर की औपचारिक शुरुआत होगी और साथ ही एक बड़ी परीक्षा भी.

राजनीति में पारिवारिक विरासत का एक और उदाहरण

भारतीय राजनीति में पारिवारिक विरासत कोई नई बात नहीं है. बिहार में भी इसका उदाहरण तब देखने को मिला जब लालू प्रसाद यादव ने अपने उत्तराधिकारी के रूप में तेजस्वी यादव को आगे बढ़ाया. तेजस्वी यादव ने समय-समय पर अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने की कोशिश की है, लेकिन व्यापक जनसमर्थन को स्थायी रूप से अपने पक्ष में करना अभी भी उनके लिए चुनौती बना हुआ है. चिराग पासवान भी इसके उदाहरण हैं. जीतनराम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा का तो पूरा परिवार राजनीति में सक्रिय है. उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दिपक प्रकाश का सीधे मंत्री बन जाने का मामला तो ताजा ताजा है. खैर अब कुछ वैसी ही पटकथा की चर्चा नीतीश कुमार और उनके पुत्र निशांत कुमार के संदर्भ में हो रही है. हालांकि यह देखना चाहिए कि कैसे वर्तमान राजनीतिक माहौल पहले की तुलना में कहीं अधिक जटिल और प्रतिस्पर्धी हो चुका है.

आसान नहीं होगी निशांत कुमार की राजनीतिक राह

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि निशांत कुमार के लिए राजनीति में सफल होना उतना आसान नहीं होगा जितना दिख रहा है. इसके पीछे कई अहम कारण हैं. जैसे नीतीश कुमार का राजनीतिक प्रभाव अब पहले जैसा नहीं रहा, और उनकी पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) भी अपेक्षाकृत कमजोर स्थिति में मानी जा रही है. इसके साथ साथ राज्य की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी का कद बढ़ा है और वह अब सत्ता के केंद्र में अधिक प्रभावशाली भूमिका निभा रही है तो आज की राजनीति में केवल पारिवारिक पहचान के आधार पर स्वीकार्यता मिलना मुश्किल होता जा रहा है. जनता अब नेताओं में व्यक्तिगत करिश्मा और जमीनी जुड़ाव को तौलकर ही फैसले लेती है. सबसे अहम है बिहार में युवा नेतृत्व की भरमार, बिहार में पहले से ही चिराग पासवान, तेजस्वी यादव, सम्राट चौधरी और प्रशांत किशोर जैसे युवा नेता सक्रिय हैं और उनका जनाधार मजबूत हैं.

अवसर के साथ चुनौती भी है मंत्री पद

ऐसे में अगर निशांत कुमार सीधे मंत्री बनाए जाते हैं, तो यह उनके लिए दोधारी तलवार साबित हो सकता है. एक ओर उन्हें प्रशासनिक अनुभव और पहचान मिलेगी, वहीं दूसरी ओर उनकी क्षमताओं पर तुरंत सवाल भी उठेंगे. बिना जमीनी राजनीतिक अनुभव के उच्च पद पर पहुंचना अक्सर अधिक कठोर जांच का कारण बनता है. राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि निशांत कुमार को दीर्घकालिक सफलता के लिए खुद की अलग पहचान बनानी होगी. विरासत शुरुआती मंच दे सकती है, लेकिन स्थायी राजनीतिक जमीन केवल जनसंपर्क, नेतृत्व क्षमता और विश्वसनीयता से ही बनती है. फिलहाल, यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या ये अटकलें हकीकत में बदलती हैं और अगर हां, तो क्या निशांत कुमार बिहार की जटिल राजनीति में खुद को साबित कर पाते हैं या नहीं.

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