RJD Rajya Sabha seats : बिहार की सियासत में राज्यसभा चुनाव को लेकर हलचल तेज हो गई है। आने वाले चुनाव न सिर्फ महागठबंधन की संख्यात्मक ताकत की परीक्षा लेंगे, बल्कि नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव के नेतृत्व कौशल और सहयोगी दलों को एकजुट रखने की क्षमता को भी सामने लाएंगे। मौजूदा हालात में विपक्ष के पास सीमित संख्या बल है, ऐसे में हर फैसला रणनीतिक रूप से अहम माना जा रहा है।
विपक्ष के पास सिर्फ एक सीट जिताने का गणित
अगले साल राज्य की 5 सीटें खाली होने वाली है. मौजुदा संख्याबल के हिसाब से जीत के लिए 41 विधायकों का समर्थन चाहिए और विधानसभा में विपक्षी दलों के सभी विधायकों की संख्या जोड़ दी जाए तो यह आंकड़ा 41 तक पहुंचता है। यह संख्या राज्यसभा की सिर्फ एक सीट जिताने के लिए पर्याप्त है। विपक्षी खेमे में सबसे ज्यादा 25 विधायक राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के हैं। इसके बाद कांग्रेस के 6, वाम दलों के 3, AIMIM के 5, VIP (आईआईपी) का 1 और BSP का 1 विधायक है। महागठबंधन के नेता होने के नाते तेजस्वी यादव के सामने चुनौती है कि वे सभी सहयोगी दलों को साथ लेकर चलें और राजद के खाते में एक राज्यसभा सीट सुनिश्चित करें। हालांकि, यह आसान नहीं होगा, क्योंकि सहयोगी दल भी अपनी-अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं और भविष्य की रणनीतियों को लेकर सतर्क हैं।
नितिन नबीन का टिकट कंफर्म…पवन सिंह को भी मिलेगा इनाम ! राज्यसभा की पांचवीं सीट पर NDA में उलझा गणित
2030 तक राज्यसभा से महागठबंधन के सिमटने की आशंका
विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार का असर महागठबंधन को राज्यसभा में भी झेलना पड़ सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर मौजूदा समीकरण बने रहे, तो 2030 तक राज्यसभा से महागठबंधन का लगभग सफाया हो सकता है। फिलहाल बिहार से राज्यसभा की कुल 16 सीटों में से राजद के पास 5 और कांग्रेस के पास 1 सीट है।
2028 और 2030 के चुनाव होंगे निर्णायक
बिहार से राज्यसभा का अगला बड़ा चुनाव 2028 की शुरुआत में होना है। इसमें राजद के फैयाज अहमद, भाजपा के सतीश चंद्र दुबे, मनन कुमार मिश्रा और शंभू शरण पटेल, तथा जदयू के खीरू महतो का कार्यकाल 7 जुलाई 2028 को समाप्त होगा। इसके बाद 2030 की शुरुआत में होने वाले चुनाव में भाजपा की धर्मशीला गुप्ता और भीम सिंह, जदयू के संजय कुमार झा, राजद के मनोज कुमार झा और संजय यादव, तथा कांग्रेस के अखिलेश प्रसाद सिंह का कार्यकाल पूरा होगा।
नंबर्स ही सबसे बड़ी चुनौती
इन सभी आगामी चुनावों को लेकर महागठबंधन के लिए सबसे बड़ी परेशानी यही है कि जीत के लिए जरूरी संख्या बल उनके पास नहीं है। मौजूदा विधानसभा संरचना में सत्ता पक्ष को स्पष्ट बढ़त हासिल है, जिससे महागठबंधन के उम्मीदवारों का जीतना बेहद मुश्किल माना जा रहा है। कुल मिलाकर, राज्यसभा चुनाव महागठबंधन के लिए सिर्फ एक चुनाव नहीं, बल्कि उसके भविष्य की दिशा तय करने वाला पड़ाव साबित हो सकता है। वहीं तेजस्वी यादव के लिए यह मौका होगा यह दिखाने का कि वे सीमित संसाधनों और कमजोर नंबर्स के बावजूद विपक्ष को कितनी मजबूती से एकजुट रख पाते हैं।