New bill to remove PM and CM : जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली पुरानी कहावत तो सुनी होगी आपने. अब इस लाठी को और मजबूत करने की कोशिश हो रही है. ताकी भैंस पूरी तरह से कंट्रोल में रहे. दरअसल 20 अगस्त को लोकसभा में गृहमंत्री अमित शाह ने तीन अहम बिल पेश किए. इन विधेयकों का उद्देश्य यह है कि अगर कोई प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या कोई भी मंत्री अपने कार्यकाल के दौरान किसी अपराध में गिरफ्तार होकर लगातार 30 दिनों तक हिरासत में रहता है और वह अपराध ऐसा है जिसकी सजा 5 साल या उससे अधिक की हो सकती है तो उसे पद से हटा दिया जाएगा.
वैसे देखा जाए तो प्रस्तावित तीन विधेयक भले अलग अलग रूप में हैं लेकिन इसका मकसद एक ही है.इन प्रस्तावित कानूनों को अलग-अलग स्वरूप में इसलिए लाया गया है ताकि केंद्र, राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों पर अलग-अलग तरीके से लागू किया जा सके. जिसमें 130 वां संविधान संशोधन बिल 2025, केंद्र और राज्य सरकारों के लिए है तो दूसरा गवर्नमेंट ऑफ यूनियन टेरिटरीज (संशोधन) बिल 2025 केंद्र शासित प्रदेशों के लिए है और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) बिल 2025 विशेष रूप से जम्मू-कश्मीर के लिए है.यानी मकसद यह है कि पूरे देश में सत्ता से जुड़े हर स्तर पर यह नियम लागू हो सके.
हालांकि इसके बिल के कई सकारात्मक पहलुओं के साथ कुछ नकारात्मक पहलू भी है. जैसे मान लेते है कि किसी भी मंत्री को 30 दिन की हिरासत के बाद पद से हटाना पहली नजर में जवाबदेही और ईमानदारी वाला कदम है लेकिन इसमें शक की गुंजाइश ये है कि क्या यह सब महज़ आरोप के आधार पर ही होगा? मतलब की कोई महज आरोपी भर है तो उसे 30 दिन की हिरासत के बाद पद से हटाया जा सकता है, तो इस बात की क्या गारंटी है कि यह कानूनी कार्रवाई राजनीतिक फायदे के लिए उठाया नहीं जाएगा ? बीते कुछ सालों में जांच एजेंसियों पर जिस तरह के आरोप लगते रहे हैं उन आरोपों के बीच इस तरह का कानून पर संदेह की नजर हमेशा हमेशा के लिए अटकी रह जाती है.
वैसे भी जो आंकड़े सामने हैं उसके हिसाब से एक वास्तविकता तो यह भी है कि जांच एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक हथियार की तरह होता रहा है. विपक्ष का आरोप है कि मौजूदा दौर में ईडी, सीबीआई जैसी संस्थाएं निष्पक्ष जांच से ज़्यादा सियासी खेल का हिस्सा बन चुकी हैं तो निचली अदालत तो प्रैक्टिस ही इस बात की करती है कैसे राजनीतिक मामलों में न्यायिक हिरासत बढ़ा दी जाए ताकि सत्ता का सुख भोगने के लिए वो भी उत्तराधिकारी बन सकें. ऐसे में अगर इस बिल के तहत केवल आरोप भर से किसी को पद से हटाना शुरू कर दिया गया,तो एक समय ऐसा भी आएगा जब सदन में विपक्षी नेता नजर भी ना आए.
कई जानकारों की मानें तो यह बिल को लोकपाल बिल के दायरे जैसा ही है, जिसमें प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री भी शामिल होंगे. लेकिन यहां फर्क यह है कि लोकपाल जांच की एक तय प्रक्रिया होती है जिसमें अपराधी होने पर जनप्रतिनिधि को उसके पद से हटाया जाता है, जबकि इस प्रस्तावित कानून में जनप्रतिनिधि को उसके पद से हटाने के लिए आरोप और हिरासत ही पर्याप्त माने जाएंगे. देखा जाए तो सही मायने में लोकतंत्र तभी सुरक्षित रहेगा जब किसी मंत्री को पद से हटाने की कार्रवाई सिर्फ़ अदालत में दोषी साबित होने के बाद हो. या फिर कम से कम ऐसे मामलों की सुनवाई हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में तेज तर्रार तरीके से की जाए.
अब आंकडें ही देखें तो मौजूदा 18वीं लोकसभा में करीब 170 सांसद ऐसे हैं जिन पर ऐसे मामले चल रहे हैं जिनमें 5 साल या उससे ज्यादा की सजा हो सकती है. इनमें सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों शामिल हैं. अगर यह कानून लागू हो गया तो फिर सवाल उठेगा कि किसके खिलाफ कार्रवाई होगी और किसे बचाया जाएगा. क्या यह कानून सबके लिए बराबर लागू होगा, या फिर यह सत्ता पक्ष के लिए नया हथियार साबित होगा?जैसा की संभावना जताया जा रहा है.
संविधान में लोकतंत्र की बुनियाद के जिस विचार का जिक्र किया गया है और भारत का कानून जिस पर टिका है उसके अनुसार किसी भी नागरिक को तब तक निर्दोष माना जाएगा जब तक अदालत उसे दोषी साबित न कर दे. अगर सिर्फ आरोप और हिरासत के आधार पर किसी मंत्री को हटाना शुरू कर दिया गया तो यह लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर कर देगा. लेकिन सत्य तो ये भी है कि सदन के अंदर जो अपराधी जनप्रतिनिधि के ओट में छिपे हुए है उन पर कार्रवाई करना गलत तो नहीं है, लेकिन सवाल यह नहीं है कि अपराधियों को सत्ता से बाहर रखना चाहिए या नहीं बल्कि सवाल यह है कि क्या ऐसे कानून, आरोप और सत्ता का इस्तेमाल राजनीतिक महत्वाकांक्षा और प्रतिशोध के लिए न्याय का नया विकल्प नहीं बन सकते? यदि यह कानून बिना सुधार के पास हुआ, तो यह व्यवस्था जवाबदेही की बजाय दमन का औज़ार बन सकता है. लोकतंत्र को मजबूत करने की बजाय यह कदम उसे कमजोर कर देगा.