Nitish Kumar politics : बिहार में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले राज्य की राजनीति इन दिनों फिर से सुर्खियों में है. हालांकि बिहार की राजनीति का यह चेहरा नया नहीं है मगर बिना किसी चुनावी बयार या सियासी तकरार के अगर चर्चाओं का बाजार गर्म है तो यह भी बिहार की राजनीति में ही संभव है. खैर…आज यानी की (20 जुलाई) मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार का 44वां जन्मदिन है. यह अवसर जितना निजी होना चाहिए उससे कहीं ज़्यादा सार्वजनिक और राजनीतिक हो गया. कई तरह के अटकलें लगाई जा रही हैं. अटकलों की कई वजहों में एक कारण यह है कि इस मौके पर ‘बिहार की मांग, सुन लिए निशांत’ जैसे पोस्टर पटना में जेडीयू कार्यालय के बाहर लगे हुए है. जिसको लेकर कहा जा रहा है कि क्या नीतीश कुमार ने अपने बेटे निशांत कुमार को जन्मदिन पर राजनीति का तोहफा दिया है ? हालांकि चर्चा तो इस बात की भी है कि यह महज कार्यकर्ताओं का जोश है और चुनाव से पहले की रणनीति का चाल भर है ? लेकिन पिछले कुछ वर्षों से बार-बार हो उठ रहे सवाल कि नीतीश कुमार के बाद जेडीयू का चेहरा कौन होगा…क्या नीतीश अपनी गद्दी निशांत को सौंपेंगे…? सियासी बदलाव का यह सवाल अब भी हवा में है और अब ऐसा लग रहा है कि पार्टी के एक वर्ग को इस सवाल का जवाब निशांत में दिखाई दे रहा है।
उधर जब जन्मदिन के मौके पर निशांत ने अपने पिता से आशीर्वाद लेने पहुंचे तो लगे हाथ सार्वजनिक मंच से नीतीश कुमार को फिर से मुख्यमंत्री बनाने की अपील दोहरा दी। अमूमन यह सामान्य पारिवारिक समर्थन जैसा है लेकिन जेडीयू नेताओं के बयानों ने इसे सियासी रंग दे दिया। कई वरिष्ठ नेताओं ने खुले तौर पर कहा कि निशांत को राजनीति में आना चाहिए ताकि पार्टी की विरासत आगे बढ़ सके। निशांत की राजनीतिक एंट्री को लेकर विपक्षी नेता तेजस्वी यादव ने तंज कसते हुए कहा कि अगर निशान नहीं आए तो बीजेपी जेडीयू को निगल जाएगी। तेजस्वी यादव का यह बयान न सिर्फ नीतीश कुमार की नेतृत्वकारी ताकत पर सवाल उठाता है ऐसा नहीं है बल्कि यह भी दर्शाता है कि विपक्ष भी निशांत की संभावित एंट्री को हल्के में नहीं ले रहा।
देखा जाए तो नीतीश कुमार उम्र और सेहत के जिस मोड़ पर हैं वहां नेतृत्व परिवर्तन की चर्चा असामान्य नहीं है। लेकिन दिक्कत इस बात को लेकर है कि नीतीश हमेशा परिवारवाद के खिलाफ खड़े रहे हैं. उनके करीबी मंत्री श्रवण कुमार ने भी इसी चीज को दोहराते हुआ दावा किया कि नीतीश नहीं चाहते कि निशांत राजनीति में आएं। लेकिन सच तो ये भी है कि राजनीति में परिस्थितियां और जमीनी हकीकत विचारों से ज़्यादा प्रभावशाली होती हैं।
चलिए मान लेते है कि जन्मदिन पर पिता द्वारा मिले राजनीति का तोहफा को स्वीकार कर निशांत राजनीति में डेब्यू कर लेते है.तो सवाल उठता है कि क्या वे जेडीयू के लिए फायदेमंद साबित होंगे? क्योंकि भले ही उनके पास नीतीश कुमार की विरासत, मजबूत राजनीतिक ब्रांड और विकास और सुशासन वाली पहचान हो लेकिन दूसरी ओर निशांत की एंट्री नीतीश की परिवारवाद विरोधी छवि को आहत करेगी और तेजस्वी यादव जहां लालू यादव की विरासत को संभालते हुए विरोधियों के एक आरोप से मुक्त हो जाएंगे. हालांकि निशांत ने बीते समय में राजनीति से दूरी बनाकर आध्यात्मिक जीवन को प्राथमिकता दी थी। जिसको लेकर उनकी एक अलग छवि है लेकिन हाल की उनकी जो सक्रियता और पार्टी कार्यकर्ताओं का दबाव है वो इस रुख में बदलाव का संकेत दे रहा है। अब आप मीडिया रिपोर्ट की मानें तो उन्हें नालंदा की हरनौत सीट से चुनाव लड़वाने की योजना पर भी पार्टी में चर्चा चल रही है। हालांकि एक बात जो और गौर करने वाला है वो ये कि यदि निशांत राजनीति में आते हैं तो जेडीयू को एक युवा चेहरा मिलेगा, जो तेजस्वी यादव और चिराग पासवान जैसे युवा नेता के सामने खड़ा हो सकता है। बिहार की राजनीति में एक बार फिर से मुकाबला युवा बनाम युवा का हो सकता है.
निशांत कुमार की संभावित राजनीतिक एंट्री केवल एक जन्मदिन की चर्चा नहीं है यह बिहार की बदलती राजनीति जमीन का पूर्वाभास है। नीतीश कुमार की उम्र, सेहत और विपक्ष की आक्रामकता को देखते हुए यह स्पष्ट है कि जेडीयू नीतीश के बाद कौन वाली रणनीति की दिशा में सोचने लगा होगा। लेकिन अभी यह तय नहीं है कि निशांत चुनाव लड़ेंगे या नहीं…उनकी राजनीतिक एंट्री भी अभी अधिकारिक नहीं है. बाकी देखते हैं नीतीश अपनी और अपनी पार्टी की राजनीति को किस करवट मोड़ते है.