भारत से कब खत्म होगा राजनैतिक आपातकाल…! Emergency के बाद 50 सालों में क्या क्या बदला?

50 Years of Emergency : किसी देश, समाज और व्यक्ति के लोकतांत्रिक होने की दौड़ में कई ऐसे पड़ाव हैं जहां ‘लोकतंत्र’ शब्द कलंकित हुआ है… इसी कड़ी में एक तारीख है  25 जून 1975  जब भारत के लोकतंत्र पर बड़ी ही निर्दयता से कालिख पोत दी गई. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा देश में  लागू यह राष्ट्रीय आपातकाल वैसे तो 21 महीनों तक रहा…लेकिन निशान आज भी भारत जैसे वैचारिक विविधता वाले देश में खुले तौर पर मौजूद है.

आपातकाल की यह घटना भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में ऐसा बड़ा मोड़ है जिसके सीधे होने का इंतजार आज भी भारत का लोकतंत्र बड़ी बेसब्री कर रहा है… क्योंकि अब जब आपातकाल को 50 साल पूरे हो गए हैं तो उस दौर के घटनाक्रम का प्रभाव आज की राजनीति में भी देखने को मिलता है.इन 50 सालों में भारतीय लोकतंत्र में आए  कई सकारात्मक और नकारात्मक बदलाव भी इसी का असर हैं….

आपातकाल  खत्म होने के तुरंत बाद जब 1977 में  लोकसभा का चुनाव हुआ तो उसमें जनता पार्टी की जीत और इंदिरा गांधी की हार ने यह तो साबित कर दिया कि भारतीय जनता ने लोकतंत्र को पुनः स्थापित करने में निर्णायक भूमिका निभाई. लेकिन फिर बाद में जब जनता के मतों को तोड़ मरोड़ कर सरकार   बनने लगी तो इसका वो पहलू भी सामने आया कि कैसे सत्ता की ताकत का दुरुपयोग राजनीति की आम घटना बन कर रह गई….हालांकि इसके बाद चुनावों में जनता अधिक सजग हुई और सत्ता के दुरुपयोग पर प्रतिक्रियाशील बनी रही लेकिन परिणाम के हिसाब से ये मिला जुला ही रहा…खैर 44वां संशोधन (1978) के तहत आपातकाल की घोषणा के लिए अधिक कठोर शर्तें लगाई गईं। नागरिक अधिकारों की रक्षा हेतु मजबूत प्रावधान भी जोड़े गए। क्षेत्रीय दलों का उदय हुआ और केंद्र में गठबंधन सरकारों की परंपरा शुरू हुई, जिससे एक पार्टी की तानाशाही पर अंकुश लगा। केशवानंद भारती’ और ‘मिनर्वा मिल्स’ जैसे ऐतिहासिक फैसलों के ज़रिए न्यायपालिका ने खुद को कार्यपालिका से अलग करने की कोशिश की.

लेकिन इसका नकारात्मक पहलू सकारात्मक पर काफी हावी रहा…क्योंकि सत्ता का केंद्रीकरण तो अब भी जारी है, यद्यपि अब आपातकाल जैसी सीधी कार्रवाई नहीं होती, लेकिन प्रधानमंत्री कार्यालय की भूमिका, राज्यों की स्वायत्तता में हस्तक्षेप जैसे पहलू बताते हैं कि सत्ता का केंद्रीकरण तो उसी तरह है जैसा की 50 साल पहले था…भले ही औपचारिक सेंसरशिप न हो, पर मीडिया संस्थानों पर दबाव, विज्ञापन सेंसरशिप और सोशल मीडिया पर निगरानी जैसे पहलू  से प्रेस और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर दबाव तो अब भी है…चुनाव आयोग, सीबीआई, ईडी, जैसी संस्थाओं की निष्पक्षता पर प्रश्न उठना इस बात का संकेत है कि लोकतंत्र पर लगी कालिख का निशान आज भी मौजूद है. क्या एक ही परिवार या नेता के इर्द-गिर्द घूमती सत्ता इस बात की ओर संकेत नहीं कर रहे कि राजनीतिक दलों के भीतर ही लोकतंत्र की कमी है ? लोकतंत्र अपने नागरिकों को विकल्प देता है…लेकिन क्या हमारे पास विकल्प है…चुनने की आजादी है…ऐसे कई सवाल जो जरूरी है आज हमारे लिए गैर जरूरी क्यों हो गए हैं…सवाल पुछना या असहमति जताना देशद्रोह जैसा क्यों हो गया है ? आपातकाल की तरह आज प्रेस की स्वतंत्रता भले पूरी तरह खत्म नहीं हुई है लेकिन क्या इस पर अनौपचारिक सेंसर नहीं लगा है ? आपातकाल से अधिक स्वतंत्र लेकिन चुनौतियों से घिरी न्यायपालिका कमजोर प्रतीत नहीं लग रही…? दबा हुआ और कमजोर मगर उपस्थित विपक्ष की भूमिका ऐसी नहीं लग रही जेल के बदले संसद में कैद है…? आपातकाल के बाद भले ही जन चेतना जागरूकता की शुरुआत हुई हो लेकिन आज की जनता आपको अधिक परिपक्व लेकिन ध्रुवीकृत नहीं लगती…? और अंत में लेकिन आखिरी नहीं  जैसा की आपातकाल के दौरान कांग्रेस का वर्चस्व था, उस हिसाब से भले ही एक से अधिक पार्टी का वर्चस्व हो लेकिन सत्ता केंद्रीकरण एक पार्टी के वर्चस्व को नहीं दिखा रहा….

आपातकाल ने भारतीय लोकतंत्र को एक ऐसा सबक दिया जो आज भी प्रासंगिक है जैसे लोकतंत्र का कोई विकल्प नहीं है। सत्ता का संतुलन जरूरी है। नागरिक अधिकारों की रक्षा जनता की सजगता से ही होती है। लेकिन  आज भले ही संवैधानिक रूप से आपातकाल न हो पर अगर संस्थाएँ कमजोर हों, प्रेस दबा हो और विपक्ष निष्क्रिय हो तो लोकतंत्र की आत्मा को खतरा बना रहता है।आपातकाल से भारत ने बहुत कुछ सीखा है,लेकिन ऐसा लगता है कि चुनौतियां जस की तस है…

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