Bihar politics: 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव के बीच दो बड़े सवाल राजनीतिक बहस के केंद्र में हैं। प्रश्न है क्या नीतीश कुमार एक बार फिर मुख्यमंत्री बनेंगे? या फिर तेजस्वी यादव की वर्षों पुरानी महत्वाकांक्षा आखिरकार पूरी होगी?
अब महागठबंधन की ओर से तो स्थिति स्पष्ट है। तेजस्वी यादव को औपचारिक रूप से मुख्यमंत्री चेहरे के रूप में पेश कर दिया गया है और गठबंधन बार-बार यह दोहरा रहा है कि यदि उनकी सरकार बनती है, तो नेतृत्व तेजस्वी के हाथों में ही रहेगा। उधर NDA खेमे में मुख्यमंत्री पद को लेकर संदेश कुछ धुंधला है। वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को चेहरा तो प्रोजेक्ट किया गया है, लेकिन अभी तक औपचारिक घोषणा नहीं की गई है। यही अनिश्चितता राजनीतिक गलियारों में चर्चा की वजह बनी हुई है।
यह सवाल इसलिए भी अहम है क्योंकि हाल के वर्षों में बीजेपी ने हरियाणा और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में चुनाव बाद नेतृत्व बदलते हुए अपने मुख्यमंत्री बैठाए हैं। भाजपा की रणनीति यह संकेत देती है कि जहां संख्या बल उसके पक्ष में हो, वहां वह अपने नेता को शीर्ष पद पर बैठाने का मौका नहीं छोड़ती। बिहार में अब तक बीजेपी को मुख्यमंत्री पद नहीं मिला है, जबकि 2005 से (बीच के लगभग तीन साल छोड़कर) NDA सत्ता में रहा है। यह बीजेपी के भीतर भी एक बड़ी महत्वाकांक्षा के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन इन सब के बीच भी एक चीज जो क्लियर है वो ये कि चुनावी लड़ाई नीतीश और तेजस्वी यादव के बीच ही है।
नीतीश और तेजस्वी की इस लड़ाई में कौन कितना मजबूत या कमजोर है इसका निर्णय जमीन पर दोनों खेमों के प्रत्याशियों को मिल रहा जनसमर्थन से किया जा सकता है। जमीनी हकीकत बताती है कि एनडीए के कई मौजूदा विधायकों के प्रति जनता में नाराज़गी है। मिथिलांचल से लेकर सीमांचल और मगध तक कई विधानसभा क्षेत्रों में लोगों की शिकायत है कि विधायक जनता के बीच नहीं जाते और स्थानीय समस्याओं के समाधान में नाकाम रहे।
बेनीपट्टी से विनोद नारायण झा हों, हायाघाट से रामचंद्र पासवान, जीवेश मिश्रा हों या अन्य कई विधायक, जगह-जगह इसी तरह की नाराज़गी झलकती है। इसके बावजूद टिकट काटने की बजाय मौजूदा चेहरों पर भरोसा बनाए रखना भाजपा की मजबूरी और रणनीति दोनों रूपों में देखा जा रहा है। जेडीयू की भी यही स्थिति है। नतीजा लोगों में एक आम राय उभरती दिखाई देती है और खुले तौर पर वो कहते हैं कि वोट मोदी-नीतीश को देंगे, लेकिन विधायक से नाराज हैं। कुछ लोग तो साफ कहते हैं कि एनडीए के विकल्प न होने की वजह से वे मजबूरी में वोट देंगे। ग्राउंड रिपोर्ट्स में यह जुबान आम सुनाई देती है कि चलो, विकास कुछ खास नहीं हुआ, लेकिन हालात लालू राज जैसे नहीं हुए। क्राइम तब भी था, अब भी है… लेकिन इतना नहीं कि डरकर घरों के दरवाजे बंद रखने पड़ें। यह संकेत है कि भाजपा और एनडीए के रणनीतिकारों को भरोसा सिर्फ मोदी-नीतीश ब्रांड पर है जिसे बनाए रखने के लिए सरकार आम जनता को योजनाओं का लाभ और जंगलराज की साए से दूर करना नहीं चाहती और हर मंच से दावा करती दिखाई देती है कि जनता आज भी 1990-2005 के दौर के जंगलराज के डर से बाहर नहीं निकली है, जबकि महागठबंधन समर्थकों का तर्क है कि यह केवल राजनीतिक नैरेटिव है, ज़मीनी हालात आज भी बेहतर नहीं।
जमीनी हकीकत ये है कि बिहार का चुनाव इस बार सिर्फ राजनीतिक नहीं, मनोवैज्ञानिक समीकरणों का भी चुनाव है। जनता को रोजगार चाहिए, शिक्षा-स्वास्थ्य में सुधार चाहिए, उद्योग चाहिए। लेकिन सुरक्षा और स्थिरता का सवाल भी उतना ही बड़ा है। एक तरफ तेजस्वी युवाओं का भरोसा जीतने की कोशिश में हैं, दूसरी तरफ नीतीश-मोदी के नाम पर भाजपा स्थिरता और योजनाओं की ‘गारंटी’ को आगे रख रही है। और यही इस चुनाव को ज़रूरत और मजबूरी के बीच संतुलन की लड़ाई बना रहा है।