Dowry violence : बीते दिनों आपने एक वीडियो देखा होगा.जिसमें एक छह साल का मासूम बच्चा कह रहा है कि पापा ने मम्मी को लाइटर से जला डाला.सोशल मीडिया पर यह वीडियो वायरल है.26 वर्षीय निक्की भाटी की बेरहमी से दहेज के लिए की गई हत्या ने आपको भी झकझोर कर रख दिया होगा अगर आप संवेदनशील व्यक्ति हैं और नहीं है तो एक बार सोशल मीडिया पर वायरल उस छह साल के मासूम बेटे का वीडियो देख लीजिए,जिसमें वह अपनी मां के जलाए जाने की सच्चाई बताता है.
जबकि यह पहली घटना नहीं है, मैं नहीं मानता की यह आखिरी होगा.यह एक ऐसी घटना है जो बार बार हमारे समाज के दिल में गहरे घाव छोड़ रही है और इस घाव का जख्म इतना गहरा है कि आप किसी भी पिता का उदाहरण ले लीजिए वो बेटी के जन्म को लेकर हिचकेगा जरूर.इस हिचकिहाट के पीछे जो ड़र है वो यह कि दुर्भाग्य से हर साल लाखों बेटियां दहेज की बलि चढ़ती हैं. इसे रोकने के लिए बने कानूनों के बावजूद भी यह खौफनाक सच्चाई है जो बेटियों के लिए काल के रूप में हमारे समाज में मौजूद है.
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार साल 2022 में भारत में कुल 6,450 दहेज हत्याएं दर्ज की गयी. अगर इसका औसत देखें तो हर दिन 18 बेटियां इसका शिकार होती है. वर्ष 2018 से 2022 के बीच कुल 34,477 बेटियों की जान दहेज हिंसा के कारण चली गई. हैरान करने वाली बात ये है कि भारत में यह समस्या भौगोलिक रूप से बेहद ही असमान रूप से फैली हुई है. उत्तर प्रदेश लगातार दहेज हत्याओं में सबसे आगे है. 2022 में अकेले उत्तर प्रदेश में 2,138 दहेज हत्या के मामले दर्ज हुए. इसके बाद बिहार (1,057 मामले) और मध्य प्रदेश (518 मामले) का स्थान है. हालांकि दक्षिण भारत में कर्नाटक,तेलंगाना और केरल में कम मामले दर्ज हुए,लेकिन दहेज हिंसा का असर वहां भी देखने को मिलता है.
आंकड़ों की मानें तो उत्तर प्रदेश ने पिछले पांच सालों में 11,488 दहेज हत्याओं के मामले दर्ज किए. यानी प्रदेश में हर दिन औसतन छह महिलाएं केवल दहेज की वजह से अपनी जान गंवा देती हैं. यह आंकड़ा यह दर्शाता है कि भारत में होने वाली हर तीसरी दहेज हत्या केवल इस राज्य में होती है. यहां दहेज से मौत का औसत 10.3 प्रति लाख महिलाएं है, जबकि राष्ट्रीय औसत 5.2 है. बिहार में यह आंकड़ा 8.9, मध्य प्रदेश में 6.6 और राजस्थान में 5.7 है. इन आंकड़ों के आधार पर यह साफ है कि दहेज हत्या की समस्या इन पांच राज्यों में गहरे पैठ चुकी है.ये पांच राज्य मिलकर देश की 70% दहेज हत्याओं के लिए जिम्मेदार हैं. 2022 में दहेज निषेध अधिनियम के तहत 13,000 से अधिक मामले दर्ज हुए ,यानी हर दो घंटे में तीन नए केस सामने आ रहे हैं.
इसमें सच्चाई यह भी है कि ये पूरी तरह से सटीक आंकड़े नहीं है,क्योंकि जानकारों की मानना है कि अधिकारिक आंकड़े भी दहेज हत्याओं की भयावहता को पूरी तरह से उजागर नहीं कर पाते हैं. जिसके पीछे उनका तर्क है कि अधिकतर डेटा राज्य स्तर पर मिलता है,जबकि जिले या शहर के स्तर पर ऐसी जानकारी प्राप्त करना मुश्किल होता है. जैसा कि बताया गया 2022 में दहेज निषेध अधिनियम के तहत 13,000 से अधिक मामले दर्ज हुए तो ये तो आंकड़े है. लेकिन यह आंकड़े केवल कागजों तक सीमित नहीं रह सकते.
अब सवाल उठता है कि इसे रोका कैसे जाए ? कौन रोकेगा ? क्योंकि इसका जिम्मेदार कोई एक व्यक्ति तो नहीं है ? और ना ही इससे कोई एक व्यक्ति पीड़ित है ? तो हमें समाज और सिस्टम को इसके खिलाफ मजबूत कदम उठाने के लिए विवश करना होगा. क्योंकि यह कोई अकेली समस्या नहीं है,बल्कि एक समग्र सामाजिक और सांस्कृतिक बीमारी है,जिसे सामूहिक प्रयासों से ही ठीक किया जा सकता है. वैसे भी दहेज हत्या केवल एक कानूनी मुद्दा नहीं है, यह हमारे समाज की मानसिकता, संस्कारों और मूल्यों का परीक्षण है. इसे खत्म करने के लिए केवल कानूनों की आवश्यकता नहीं है,बल्कि हमें अपनी सोच को बदलने की जरूरत है.
क्या कदम उठाए जाने चाहिए?
- कानूनी सख्ती: दहेज के खिलाफ बनाए गए कानूनों को केवल कागजों तक सीमित नहीं रहने देना चाहिए. पुलिस को इन मामलों में अधिक त्वरित और प्रभावी कार्यवाही करनी चाहिए. साथ ही न्यायालयों को भी मामलों को शीघ्र निपटाने के लिए कदम उठाने चाहिए.
- सामाजिक जागरूकता: दहेज प्रथा को समाप्त करने के लिए समाज को जागरूक करना अत्यंत महत्वपूर्ण है. यह हम सबकी जिम्मेदारी बनती है कि हम इस कुरीति को न केवल स्वीकार न करें, बल्कि इसे खुलकर समाज में हर स्तर पर चुनौती दें.
- शिक्षा और जागरूकता कार्यक्रम: शिक्षा के जरिए दहेज के खिलाफ सोच को बदलने की दिशा में काम किया जा सकता है. स्कूलों और कॉलेजों में इस मुद्दे पर खुलकर चर्चा होनी चाहिए ताकि युवा पीढ़ी दहेज की मानसिकता से बाहर आ सके.