Indian Railways News: छठ पूजा का पर्व नजदीक आते ही बिहार लौटने वालों की भीड़ एक बार फिर देशभर के रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों पर उमड़ पड़ी है। गेट पर लटके यात्री, टॉयलेट में बैठे लोग, और टिकट लेकर भी सीट से वंचित यात्रियों का यह नजारा मानों हर साल का नियम बन गया है। इस अफरा-तफरी में कहीं आस्था की तपिश है, तो कहीं व्यवस्था की विफलता। हर साल यही सवाल उठता है, क्या त्योहार पर अपने घर लौटना इतना कठिन होना चाहिए? क्या आस्था के इस महापर्व में यात्रा परीक्षा बन जाए? बिहार के लोगों के लिए छठ पूजा कोई त्योहार नहीं, परंपरा है। और इस परंपरा को निभाने के लिए वे रातभर खड़े होकर, थकान और असुविधा झेलकर भी अपने गांव की मिट्टी तक पहुंचने की कोशिश करते हैं।
रेल में जगह नहीं, तो बसों का रुख। बसों में जगह नहीं, तो विमान का सहारा। लेकिन हर रास्ते पर एक ही सूरत सामने है ,शोषण की। रेल में टिकट ब्लैक में, बसों में तीन गुना किराया और उड़ानों में आसमान छूते दाम। दिल्ली से पटना की फ्लाइट जहां सामान्य दिनों में छह हजार की होती है, वहीं अब 11-12 हजार रुपये में भी मुश्किल से मिल रही है। यही हाल दिल्ली से गया, दरभंगा और वाराणसी तक का है। DGCA के निर्देशों के बावजूद एयरलाइंस खुलेआम लूट में शामिल हैं।
बसों का हाल तो और भी बेहाल है। सामान्य दिनों में दिल्ली से पटना की बस 800 से 1000 रुपये में यात्रा कराती थी, अब वही सीट 2000 से 2500 रुपये में बेची जा रही है। स्लीपर बसों का किराया 4000 रुपये तक पहुंच गया है। यात्रियों को टिकट तक नहीं दिया जा रहा। भीड़ का फायदा उठाकर प्राइवेट बस ऑपरेटर मनमानी कर रहे हैं। छठ का नाम आते ही हर कोई अवसर तलाशने में जुटा है ,कोई भावनाओं से, कोई जेब से मुनाफा कमा रहा है।
त्योहार के इस मौसम में बिहार लौटते लोग सिर्फ पूजा करने नहीं जा रहे। इस बार उनके कंधों पर एक और जिम्मेदारी है, लोकतंत्र की। विधानसभा चुनाव नजदीक हैं और लाखों कामगार मताधिकार का इस्तेमाल करने भी घर लौट रहे हैं। वे चाहते हैं कि इस बार ऐसी सरकार बने जो रोजगार दे, ताकि उन्हें मजबूरी में दिल्ली या मुंबई की फैक्ट्रियों में पलायन न करना पड़े। छठ पर लौटती यह भीड़ सिर्फ आस्था की नहीं, आकांक्षा की भी कहानी है। यह उन थके चेहरों का जुलूस है जो हर साल यह सपना लेकर लौटते हैं कि शायद अगली बार वे अपने ही राज्य में रह पाएंगे, अपने परिवार, अपनी मिट्टी, अपने त्योहार के साथ। लेकिन यह सपना हर साल ट्रेनों की खिड़कियों में लटक जाता है, बसों की छतों पर खो जाता है और एयरलाइंस के किरायों में जल जाता है।