Chhath Mahaparv: लोक आस्था का महापर्व छठ हिंदू धर्म में सबसे कठिन और पवित्र व्रतों में से एक है. यह चार दिवसीय अनुष्ठान केवल सूर्य देव और छठी मैया को समर्पित नहीं, बल्कि यह प्रकृति जीवन चक्र और अटूट मानवीय संकल्प के प्रति हमारी गहरी श्रद्धा का प्रतीक भी है। यह महापर्व हमें प्रकृति के साथ ताल मेल बैठना और स्वयं को शुद्ध करने की प्राचीन शिक्षा देता है। जहां डूबते और उगते सूर्य दोनों की पूजन की अनूठी परंपरा हैं।
कब है इस बार का चार दिवसीय अनुष्ठान
पहला दिन – नहाए खाए 25/10/2025
दूसरा दिन – खरना 26/10/2025
तीसरा दिन – संध्या अर्घ्य 27/10/2025
चौथा दिन – उषा अर्घ्य 28/10/2025
क्या है हर दिन का मतलब
नहाए खाए
यह पर्व का पहले दिन है, जो शारीरिक शुद्धिकरण का प्रतीक है। व्रती पवित्र नदियों में स्नान करके व्रत का संकल्प लेती है। इस दिन सात्विक भोजन जैसे लौकी भात खाया जाता है। लौकी भात का सादा भोजन, तामसिक विचारों को त्यागकर मन को शांत और एकाग्र करने का पहला पाठ है, ताकि महाव्रत का बीज सही भूमि में पड़ सके।
खरना
खरना का अर्थ है शुद्धता, यह 36 घंटों की निर्जला महाव्रत का प्रवेश द्वार है। पूरे दिन उपवास के बाद शाम को मिट्टी के चूल्हे पर गुड़ और चावल की खीर और रोटी का महाप्रसाद बनाया जाता है। यह प्रसाद ग्रहण करने के साथ ही व्रती का कठिन निर्जला व्रत शुरू हो जाता है, जो उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत बनाता है।
संध्या अर्घ्य
यह दिन प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और जीवन चक्र को स्वीकार करने का सबसे महत्वपूर्ण क्षण है। डूबते सूर्य को अर्घ्य देना सिखाता है, कि जीवन में बदलाव और अंत अपरिहार्य हैं, और हर अवस्था का सम्मान होना चाहिए। यह बीते हुए कल और प्रकृति की शक्ति के प्रति हमारी कृतज्ञता का प्रतीक है।
उषा अर्घ्य
छठ पर्व का समापन उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देने के साथ होता है। यह दिन आशा, समृद्धि और नए जीवन की शुरुआत का प्रतीक है। सूर्य की पहली किरणें ग्रहण करने के बाद व्रती प्रसाद ग्रहण करके व्रत का पारण करती हैं। यह समय बताता है कि कठोर साधना का फल हमेशा सुखद और कल्याणकारी होता है।
छठ महापर्व का यह 4 दिन वास्तव में जीवन जीने की एक संपूर्ण चक्र हैं। नहाय-खाय हमें शुद्धता सिखाता है, खरना आत्म-नियंत्रण और संकल्प, संध्या अर्घ्य जीवन के उतार चढ़ाव को स्वीकारने का धैर्य, और उषा अर्घ्य हमें आशा और आरोग्य की शक्ति देता है। यह महापर्व एक अनुष्ठान नहीं बल्कि प्रकृति स्वास्थ्य और समर्पण का प्रतीक है।