छठ महापर्व की शुरुआत…नहाय-खाय के साथ आज से शुरू हुआ सूर्य उपासना का चार दिवसीय व्रत

Chhath Puja : लोक आस्था का महापर्व छठ पूजा आज शनिवार से विधिवत रूप से आरंभ हो गया है. घाटों पर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने लगी है और पूरे बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश से लेकर देशभर के प्रवासी क्षेत्रों तक भक्ति और पवित्रता का माहौल बन गया है. सूर्य देव और छठी मैया की उपासना को समर्पित यह पर्व चार दिनों तक चलता है, जिसमें नहाय-खाय, खरना, संध्या अर्घ्य और उषा अर्घ्य की धार्मिक विधियां शामिल हैं. इस वर्ष छठ पर्व 25 अक्टूबर (शनिवार) से शुरू होकर 28 अक्टूबर (मंगलवार) तक चलेगा. व्रत रखने वाली महिलाएं, जिन्हें व्रती कहा जाता है, संतान की लंबी उम्र, परिवार की सुख-समृद्धि और आरोग्य के लिए इस कठिन तपस्या का संकल्प लेती हैं.

पहला दिन… नहाय-खाय से आरंभ

छठ महापर्व की शुरुआत नहाय-खाय की विधि से होती है. यह दिन व्रती के शुद्धिकरण का प्रतीक माना जाता है. सुबह-सुबह श्रद्धालु गंगा, नदी, तालाब या किसी पवित्र जलाशय में स्नान करते हैं. स्नान के बाद घर और पूजा स्थल को पूरी तरह से स्वच्छ किया जाता है क्योंकि धार्मिक मान्यता है कि छठी मैया स्वच्छता और पवित्रता की देवी हैं, और किसी प्रकार की अशुद्धि उनके पूजन में बाधा मानी जाती है. व्रती इस दिन केवल एक बार भोजन करते हैं, जिसे नहाय-खाय का प्रसाद कहा जाता है. यह भोजन मिट्टी के चूल्हे पर आम की लकड़ी या गोबर के उपले से पकाया जाता है ताकि उसमें सात्विकता बनी रहे. भोजन में कद्दू की सब्जी, चने की दाल और सादा चावल बनाया जाता है. इसे कांसे या पीतल के बर्तन में परोसा जाता है. इसी दिन व्रती अगले तीन दिनों के कठोर व्रत का संकल्प लेते हैं.

दूसरा दिन… खरना व्रत

खरना छठ पूजा का दूसरा और सबसे अनुशासित दिन होता है. इस दिन व्रती पूरे दिन निराहार और निर्जल रहते हैं. शाम को वे स्नान के बाद प्रसाद तैयार करते हैं,गुड़ से बनी खीर, रोटी और केले का प्रसाद जिसे छठी मैया को अर्पित किया जाता है. इसके बाद व्रती उसी प्रसाद का सेवन करते हैं और फिर अगले 36 घंटे तक बिना अन्न और जल के उपवास रखते हैं.

तीसरा दिन… संध्या अर्घ्य

छठ पूजा का तीसरा दिन सबसे भव्य और मनोहर दृश्य प्रस्तुत करता है. इसे संध्या अर्घ्य कहा जाता है. इस दिन व्रती अपने परिवार और समाज के साथ घाटों पर जाकर अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य अर्पित करते हैं. पूरे घाटों पर व्रतियों और श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है, महिलाएं परंपरागत वस्त्रों में सजकर सूर्य देव की आराधना करती हैं. लोकगीतों की गूंज और ढोल-नगाड़ों की ध्वनि से पूरा माहौल आस्था से भर उठता है.

चौथा दिन…उषा अर्घ्य और व्रत का समापन

छठ महापर्व का चौथा और अंतिम दिन उषा अर्घ्य या भोर का अर्घ्य कहलाता है. इस दिन व्रती उगते सूर्य को अर्घ्य अर्पित करते हैं. यह अर्घ्य संतान, स्वास्थ्य और समृद्धि की कामना के साथ दिया जाता है. उगते सूर्य की लालिमा जब जल में प्रतिबिंबित होती है, तो पूरा वातावरण भक्तिभाव से ओतप्रोत हो उठता है. इसी के साथ व्रती अपने 36 घंटे के निर्जला व्रत का पारण करते हैं.

सूर्य और छठी मैया की आराधना का महत्व

शास्त्रों के अनुसार, कार्तिक मास में सूर्य अपनी नीच राशि में होता है. इसीलिए इस काल में सूर्य की उपासना को अत्यंत फलदायी माना गया है. वहीं छठी मैया को संतान, समृद्धि और परिवार की रक्षा करने वाली देवी कहा गया है. लोक परंपरा के अनुसार, छठ पर्व की शुरुआत त्रेतायुग में हुई थी, जब भगवान राम और माता सीता ने अयोध्या लौटने के बाद सूर्य की उपासना की थी. तब से यह पर्व लोक आस्था और शुद्धता का प्रतीक बना हुआ है.

बिहार और पूर्वांचल के हर शहर और गांव में घाटों की सफाई, सजावट और रोशनी का कार्य पूरा हो चुका है. प्रशासन ने सुरक्षा और स्वच्छता के विशेष इंतजाम किए हैं. प्रवासी भारतीयों के लिए यह पर्व भावनात्मक जुड़ाव का अवसर बनता है,दिल्ली, मुंबई, कोलकाता से लेकर दुबई और न्यूयॉर्क तक लोग छठी मैया की पूजा करते दिखाई दे रहे हैं. छठ केवल एक पर्व नहीं, बल्कि लोकजीवन की वह परंपरा है, जो प्रकृति, शुद्धता और पारिवारिक एकता का संदेश देती है. सूर्य की उपासना के इस चार दिवसीय तप में पूरे समाज की सामूहिक श्रद्धा झलकती है,जहां भक्ति ही सबसे बड़ी शक्ति बन जाती है.

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