Chhath mahaparva: छठ महापर्व का तीसरा दिन संध्या अर्घ्य के नाम से जाना जाता है। इसे पूरे चार दिवसीय अनुष्ठान का सबसे पवित्र दिन माना जाता है। खरना के महाप्रसाद के बाद शुरू हुआ 36 घंटे का कठिन निर्जला व्रत इस दिन अपनी पराकाष्ठा पर होता है। यह सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि प्रकृति के परिवर्तन को सहर्ष स्वीकारने का एक आध्यात्मिक प्रतीक है।
इस चार दिवसीय महापर्व में सूर्य को अर्घ्य दो बार दिया जाता है लेकिन डूबते सूर्य की उपासना इसे अद्वितीय बनती है। उदय होते सूर्य की पूजा तो हर धर्म में है, लेकिन अस्त होते सूर्य को पूजना सिर्फ छठ ही सीखता है। छठ इस बात का प्रतीक है कि जीवन का चक्र निरंतर चलता रहता है, और हर अंत एक नए आरंभ की नींव रखता है।
वैज्ञानिक मानते हैं कि सूर्यास्त के समय सूर्य से निकलने वाली किरणे शरीर के लिए अत्यंत लाभदायक होती है। इस समय सूर्य के सामने खड़े होकर ध्यान लगाने से शरीर में ऊर्जा का संतुलन बेहतर होता है। ऐसी मान्यता है की संध्या अर्घ्य के समय सूर्य देव और छठी मैया अपनी कृपा की चरम सीमा पर होते हैं। व्रती परिवार के स्वास्थ्य संतान की दीर्घायु और सुख समृद्धि की कामना करती है, और माना जाता है कि इस पवित्र क्षण में उनकी हर मनोकामना पूर्ण होती है।
संध्या अर्घ्य के दिन व्रती पूरे दिन निर्जल उपवास का पालन करती है शाम को शुद्ध वस्त्र धारण करके परिवार के साथ घाट पर जाती है बांस की टोकरी या सूप में सभी पूजन सामग्री सजाई जाती है। इसमें मुख्य रूप ठेकुआ, मौसमी फल (जैसे केला, सेब, संतरा), गन्ना, मूली, नींबू, पान, सुपारी, चावल, दीया और सिंदूर रखे जाते हैं। यह डाला प्रकृति की प्रचुरता का प्रतीक है।
व्रती जल कुंड या नदी में प्रवेश कर सूर्य देव के समक्ष खड़ी होती है और सुख को हाथ में लेकर भक्ति भाव से सूर्य देव और छठी मैया का ध्यान करती है, फिर परिवार के लोग दूध और जल के मिश्रण से सूर्य देव को व्रती को अर्घ्य दिलवाते हैं। अर्धी देते समय वृति मन में अपनी परिवार की सुख और समृद्धि के लिए ध्यान करती है।