36 घंटे के निर्जला व्रत का समापन…जानें उषा अर्घ्य का महत्व और पारण..!

Usha arghya Chhath mahaparva: इस चार दिवसीय महापर्व का चौथा और अंतिम दिन उषा अर्घ्य सबसे पवित्र होता है। 36 घंटे के निर्जला व्रत के बाद इस दिन उगते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत का समापन किया जाता है। सप्तमी की सुबह सूर्य देव से पहले व्रती परिवार के साथ उसी घाट पर पहुंचती है। जहां संध्या अर्घ्य दिया जाता है। रात भर जागरण करने के बाद यह भोर में स्नान करके पवित्र हो जाते हैं।।

व्रती नदी तालाब या घाट के किनारे खड़े होकर पूर्व दिशा की ओर मुख करके सूर्योदय का इंतजार करती है। जैसे ही सूर्य की पहली किरण दिखाई देती है, व्रती कमर या घुटनों तक पानी में उतरते ही हाथों में फलों से भरा सूप लेकर खड़ी हो जाती है, और फिर परिवार वाले संध्या अर्घ्य के जैसे ही दूध और जल से व्रती को अर्द्ध दिलवाते हैं।

36 घंटे के कठिन निर्जला व्रत के बाद सुबह का अर्घ्य यानी कि उषा अर्घ्य के बाद पारण किया जाता है। जिसमें छठ का प्रसाद ठेकुआ, नारियल पानी, गाने का रस या शरबत होता है। घाट से लौट कर सबसे पहले धर्म के आंगन में छठी माता को प्रणाम किया जाता है। जहां व्रत रखा गया था उस स्थान पर प्रसाद रखकर व्रती सबसे पहले कच्चे दूध शरबत या गन्ने का रस पीती है।

ऊषा अर्घ्य में उगते सूर्य की पूजा नई शुरुआत, आशा और नए जीवन का प्रतीक है। संध्या में डूबते सूर्य और प्रातः उगते सूर्य दोनों को अर्घ्य देकर जीवन के चक्र को पूर्ण किया जाता है। छठ पूजा का यह अंतिम दिन पूरे परिवार को एक साथ इकट्ठा करता है।

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