कमांडर माडवी हिडमा की हत्या माओवादियों के लिए क्यों है बड़ा झटका…? नक्सलवाद के खात्मा के लिए कितना जरूरी था ये ऑपरेशन

Commander Madvi Hidma : लगभग तीन दशकों तक बस्तर के घने जंगलों में एक नाम खौफ, किंवदंती और रहस्य की तरह गूंजता रहा, माड़वी हिडमा. माओवादियों के सबसे शक्तिशाली और खूंखार कमांडरों में गिने जाने वाले हिडमा की मौत मंगलवार को आंध्र प्रदेश पुलिस के साथ मुठभेड़ में हो गई. सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि यह घटना पिछले 20 वर्षों में CPI (माओवादी) के लिए सबसे बड़ा झटका है. यह सिर्फ इसलिए नहीं कि हिडमा संगठन के सबसे खूनी हमलों का सूत्रधार था, बल्कि इसलिए भी कि घटती ताकत, बूढ़े होते नेतृत्व और वैचारिक खालीपन के दौर में वह आंदोलन का अंतिम प्रेरक चेहरा था.

कौन था हिडमा वास्तविकता

हिडमा की यात्रा शुरू हुई सुकमा-बीजापुर सीमा के बेहद दूरस्थ गाँव पुवर्ती से. 1991 में वरिष्ठ माओवादी नेताओं रमन्ना और बदरन्ना ने उसे बाल संघम के तहत अपने गिरोह में भर्ती किया था. इसके बाद हिडमा ने बीते तीन दशकों तक बस्तर के घने जंगलों में एक लड़ाका, फिर प्रशिक्षक और आखिर में माओवादी युद्ध मशीन का सबसे निर्णायक चेहरा के रूप में अपना जीवन बिताया.

उसकी पहचान हमेशा धुंध में रही कभी मांडवी, कभी माड़वी पर माओवादी कैडरों और खासकर आदिवासी कार्यकर्ताओं के बीच वह एकदम स्पष्ट था जो उसकी पहचान थी. सबसे बड़ा चेहरा तो ये था कि वो बस्तर की ज़मीन से निकला नेता था. तेलुगुभाषी नेतृत्व वाले संगठन में वह एकमात्र शीर्ष आदिवासी चेहरा था, जिसकी बात छत्तीसगढ़ में सबसे अधिक मानी जाती थी. मीडिया रिपोर्ट में एक वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी के हवाले से बताया गया कि वो तेलुगु प्रभुत्व वाले संगठन में वह शीर्ष पद पर अकेला स्थानीय आदिवासी था, इसलिए कैडर उसके लिए जान देने को तैयार थे.

हिडमा की खौफनाक विरासत

सबसे पहले हिडमा 2004 तक वह कोंटा एरिया कमेटी का सचिव बना. फिर 2007 में कंपनी नंबर 3 का कमांडर और 2009 में माओवादियों की सबसे शक्तिशाली लड़ाकू टुकड़ी PLGA बटालियन नंबर 1 का प्रमुख. 2009 से 2021 के बीच, बस्तर में जो भी सबसे घातक हमले हुए उनके पीछे वही था. इसके अलावा इन हमलों में भी उसकी बड़ी भुमिका थी.

  • ताड़मेटला (2010): 76 CRPF जवान शहीद
  • बांकुपारा (2017): 12 CRPF जवान
  • बुर्कापाल (2017): 25 CRPF जवान
  • मिनपा (2020): 17 जवान
  • तेकुलगुडेम-पेडागेलुर (2021): 22 जवान

इसके अलावा, 2013 झीरम घाटी हमले में भी उसकी महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है.

सुरक्षा बल उसे क्यों नहीं पकड़ पाए?

आत्मसमर्पण कर चुके माओवादी उसे कुशल जल्लाद बताते थे इलाक़े को ऐसे पढ़ता था जैसे हथेली पर नक्शा बना हो. हमले में कभी नहीं घबराता. हिडमा को घेरने के कई अभियान चलाए गए,ऑपरेशन प्रहार (2017), करेगुट्टा हिल्स तैनाती (2024) कुल मिलाकर हजारों जवानों की भागीदारी के बावजूद वह हर बार बच निकला. उसकी मायावी क्षमता के पीछे तीन बातें थीं… वो हमेशा अपने बनाए प्लान के हिसाब से चलता था. जिसमें संकेंद्रित सुरक्षा घेरा तो वो कभी सड़क का उपयोग नहीं करता था, उसका रास्ता सिर्फ ढलान, नाले, घने जंगल के बीच होकर निकलता था और इसके साथ साथ उसे जंगल के हर इंच की समझ थी.

माओवाद का बीते वर्षों में संगठन बूढ़ा, कमजोर और संसाधनों की कमी से जूझ रहा है. वैचारिक खिंचाव खत्म, नई भर्ती कम, सुरक्षित ठिकाने सिकुड़े. ऐसे दौर में हिडमा कैडरों के लिए एकमात्र प्रेरणा था जो नेता भी था और प्रतीक भी. माओवादियों ने इसी साल दबाव में उसे केंद्रीय समिति में शामिल किया था. बसवराजू की मौत के बाद, खुफिया एजेंसियों के मुताबिक वास्तविक सैन्य फैसले वही ले रहा था. कहते हैं कि उसकी माँ द्वारा किए गए आग्रह बेटा, घर लौट आओ का जवाब हमेशा एक ही था कि मैं लड़ूँगा, चाहे अकेला रह जाऊँ.

उसकी मृत्यु क्यों मायने रखती है?

विशेषज्ञों के अनुसार हिडमा की हत्या से आंदोलन का मनोबल चरमरा जाएग और कैडर बिखर सकते हैं. इसके अलावा सीधे संघर्ष से बचने की रणनीति अपनाई जा सकती है और पामेड़ के घने जंगलों में और गहराई तक पलायन संभव हो सकता है. कभी सीआरपीएफ के पूर्व DG के. दुर्गा प्रसाद ने कहा था कि अगर हिडमा मारा गया, तो कार्यकर्ताओं का मनोबल पूरी तरह टूट जाएगा और उनका पुराना बयान आज सटीक प्रतीत होता दिख रहा है. अब वह दिन आ चुका है. जब हिडमा का मौत माओवादी आंदोलन की रीढ़ टूटने का संकेत दे रहा है. हिडमा की मौत सिर्फ एक मुठभेड़ नहीं बल्कि एक युग का अंत है जो माओवादी आंदोलन के भविष्य की दिशा तय कर सकती है. जिसको लेकर विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि यदि राज्य इस खालीपन को विकास, भरोसे और सुशासन से नहीं भरेगा, तो जंगलों में संघर्ष का कोई नया रूप उभर सकता है.

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