मौजूदा राज्यसभा सांसदों में से किसे दोबारा मौका देगी JDU… जानिए प्रदेश की पांच सीटों पर कौन पड़ रहा कमजोर

Bihar politics : बिहार की राजनीति में राज्यसभा चुनाव को लेकर हलचल तेज हो गई है. Nitish Kumar की पार्टी Janata Dal (United) (जेडीयू) के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि पार्टी अपने दो मौजूदा राज्यसभा सांसदों में से किसे दोबारा मौका देगी. प्रदेश की पांच सीटों पर होने वाले राज्यसभा चुनाव में जेडीयू दो सीटें जीतने की स्थिति में मानी जा रही है, जबकि उसके दो सांसदों का कार्यकाल अप्रैल में पूरा हो रहा है.

रामनाथ ठाकुर या हरिवंश? सस्पेंस बरकरार

जेडीयू के जिन दो सांसदों का कार्यकाल समाप्त हो रहा है, उनमें एक राज्यसभा के उपसभापति Harivansh Narayan Singh हैं और दूसरे केंद्रीय मंत्री Ram Nath Thakur. पार्टी सूत्रों के अनुसार, दोनों में से किसी एक को ही रिपीट किए जाने की संभावना है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नीतीश कुमार के सामाजिक समीकरणों और अति पिछड़ा वर्ग (EBC) पर फोकस को देखते हुए रामनाथ ठाकुर की दावेदारी मजबूत मानी जा रही है. रामनाथ ठाकुर, बिहार के दिग्गज समाजवादी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री Karpoori Thakur के पुत्र हैं. कर्पूरी ठाकुर को हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा भारत रत्न से सम्मानित किया गया था, जिससे उनके परिवार की राजनीतिक साख और बढ़ी है. रामनाथ ठाकुर 2014 में पहली बार राज्यसभा पहुंचे थे और वर्तमान में उनका दूसरा कार्यकाल चल रहा है. संसदीय राजनीति में आने से पहले वे बिहार सरकार में मंत्री रह चुके हैं. केंद्र में मंत्री बनने के बाद भी वे जेडीयू और नीतीश कुमार के भरोसेमंद नेताओं में गिने जाते हैं.

तीसरी पारी पर पार्टी का अनलिखा नियम

जेडीयू का रिकॉर्ड रहा है कि वह आम तौर पर किसी नेता को विधान परिषद या राज्यसभा में तीसरी बार मौका नहीं देती. इस संदर्भ में पूर्व केंद्रीय मंत्री R. C. P. Singh और वरिष्ठ नेता Vashishtha Narayan Singh जैसे नाम उदाहरण के तौर पर लिए जाते हैं, जिन्हें तीसरी बार उच्च सदन में नहीं भेजा गया. हालांकि, अपवाद भी रहे हैं. दवा उद्योग से जुड़े और किंग महेंद्र के नाम से मशहूर Mahendra Prasad को तीन बार राज्यसभा भेजा गया था. विधान परिषद में भी कुछ नेताओं को तीसरी पारी मिली है. इसी पृष्ठभूमि में सवाल उठ रहा है कि क्या रामनाथ ठाकुर को स्पेशल केस मानते हुए तीसरी बार राज्यसभा भेजा जाएगा? राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अति पिछड़ा वर्ग की राजनीति नीतीश कुमार की सोशल इंजीनियरिंग का अहम हिस्सा रही है, ऐसे में पार्टी इस अनलिखे नियम को तोड़ सकती है.

हरिवंश की स्थिति क्यों कमजोर मानी जा रही?

राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह जेडीयू के पहले ऐसे नेता हैं जो इस संवैधानिक पद तक पहुंचे. वे वरिष्ठ पत्रकार रहे हैं और पूर्व प्रधानमंत्री Chandra Shekhar के मीडिया सलाहकार भी रह चुके हैं. 2018 से वे राज्यसभा के उपसभापति पद पर हैं और दो कार्यकाल में लगभग सात साल पूरे कर चुके हैं. हालांकि, 2022 में जब नीतीश कुमार ने एनडीए छोड़कर महागठबंधन का दामन थामा था, तब हरिवंश ने पार्टी की इच्छा के विपरीत उपसभापति पद से इस्तीफा नहीं दिया. उन्होंने संवैधानिक पद की मर्यादा का हवाला दिया था. जेडीयू के भीतर एक धड़ा इसे भाजपा के प्रति उनकी नजदीकी के रूप में देखता है. अब जबकि नीतीश दोबारा एनडीए में लौट चुके हैं, तब भी उस प्रकरण का असर उनकी दावेदारी पर पड़ सकता है.

दूसरी सीट पर मनीष वर्मा का नाम चर्चा में

जेडीयू कोटे की दूसरी सीट के लिए पार्टी महासचिव Manish Verma का नाम तेजी से उभरकर सामने आया है. पूर्व आईएएस अधिकारी रहे मनीष वर्मा को नीतीश कुमार का बेहद करीबी माना जाता है. वे पार्टी के संगठनात्मक कामकाज को देखते हैं और जमीनी स्तर पर सक्रिय भूमिका निभाते हैं. राजनीतिक गलियारों में उन्हें संभावित उत्तराधिकारी के रूप में भी देखा जा रहा है. जेडीयू के एक अन्य वरिष्ठ नेता Sanjay Jha पहले से राज्यसभा सदस्य हैं और वर्तमान में पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष भी हैं. चर्चाएं हैं कि भाजपा की सहमति से संजय झा को राज्यसभा उपसभापति पद के लिए आगे बढ़ाया जा सकता है, जबकि मनीष वर्मा को राज्यसभा भेजा जा सकता है. जेडीयू के सामने सामाजिक संतुलन, संगठनात्मक मजबूती और गठबंधन राजनीति, तीनों को साधने की चुनौती है. यह देखना दिलचस्प होगा कि नीतीश कुमार अनुभव और वफादारी को तरजीह देते हैं या संगठनात्मक भविष्य को. अगले कुछ दिनों में पार्टी की आधिकारिक घोषणा के साथ तस्वीर साफ हो जाएगी.

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