महादेव की नगरी में शक्तिपीठ..! काशी का वो मंदिर जहां गिरे थे माता सती के कर्णफूल, गर्भगृह में दो प्रतिमाओं की होती है पूजा

Mata vishalakshi mandir : आदि शक्ति की आराधना को समर्पित चैत्र नवरात्रि इस वर्ष 19 मार्च से प्रारंभ हो रही है. इस अवसर पर देश-दुनिया के श्रद्धालु वाराणसी स्थित प्रसिद्ध विशालाक्षी मंदिर में दर्शन और पूजन के लिए पहुंचते हैं. यह मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है और धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र है.

पौराणिक मान्यता से जुड़ा है शक्तिपीठ

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, राजा दक्ष के यज्ञ में देवी सती द्वारा आत्मदाह के बाद भगवान शिव उनके शरीर को लेकर ब्रह्मांड में विचरण करने लगे. तब देवताओं के अनुरोध पर भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के 51 भाग किए. जहां-जहां उनके अंग गिरे, वहां शक्तिपीठ स्थापित हुए. काशी में देवी का कर्णकुंडल गिरने से यह स्थान विशालाक्षी शक्तिपीठ के रूप में प्रसिद्ध हुआ. विशालाक्षी शक्तिपीठ दशाश्वमेध घाट के पास मीरघाट क्षेत्र में स्थित है और मणिकर्णिका घाट से कुछ दूरी पर है. मंदिर से प्रसिद्ध काशी विश्वनाथ मंदिर और अन्नपूर्णा मंदिर भी नजदीक हैं, जिससे श्रद्धालुओं को एक साथ कई प्रमुख तीर्थों के दर्शन का अवसर मिलता है.

दक्षिण भारतीय शैली में हुआ पुनर्निर्माण

इतिहासकारों के अनुसार मंदिर का पुनर्निर्माण विजयनगर साम्राज्य के शासकों द्वारा कराया गया था. 8वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य ने यहां श्रीयंत्र की स्थापना की थी. वर्ष 1908 में दक्षिण भारतीय भक्तों ने मंदिर का जीर्णोद्धार कराया, जिसके कारण यहां आज भी दक्षिण भारतीय पूजा-पद्धति का प्रभाव देखा जाता है. मंदिर में मां विशालाक्षी की दो प्रतिमाएं स्थापित हैं, एक चल और दूसरी अचल. नवरात्रि के दौरान विजयादशमी पर चल प्रतिमा की विशेष शोभायात्रा निकाली जाती है, जबकि अचल प्रतिमा की विशेष पूजा कजरी तीज और दीपावली के बाद अन्नकूट पर होती है.

क्या है मंदिर पहुंचने का रास्ता

मंदिर वाराणसी कैंट रेलवे स्टेशन से लगभग 3–5 किमी और लाल बहादुर शास्त्री अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डा से करीब 27 किमी दूर स्थित है. यहां पहुंचने के लिए गौदौलिया या दशाश्वमेध क्षेत्र तक सार्वजनिक वाहन या कैब की सुविधा उपलब्ध है. चैत्र नवरात्रि के दौरान यहां विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक आयोजन होने से श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ने की संभावना है.

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