अभी और कितना गिरेगा रुपया..! रुपये में गिरावट और महंगाई का आम जनता की जेब पर क्या पड़ेगा असर

INR USD Exchange Rate: सरकार भले दावा कर रही हो कि देश की अर्थव्यवस्था दुनियां सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है.लेकिन हाल के वर्षों में रुपये की गिरती कीमत और बढ़ती महंगाई को लेकर जो वास्तविक तस्वीरें सामने आ रही है वो इन दावों की पोल खोल रही है. अब देखें तो जब Narendra Modi ने 2014 में प्रधानमंत्री पद संभाला था, तब एक अमेरिकी डॉलर लगभग ₹60 के आसपास था. और वर्तमान में एक डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत लगभग 95 रुपये हो गया है. जो बताता है कि रुपया काफी कमजोर हुई है.

रुपये में गिरावट पर क्या है सरकार का तर्क

रुपये के गिरती किमत को लेकर वित्त मंत्री Nirmala Sitharaman ने संसद में कहा कि वैश्विक परिस्थितियों के बावजूद भारतीय रुपया अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में बेहतर प्रदर्शन कर रहा है. उनका यह भी कहना है कि रुपये की कमजोरी को केवल गिरावट के रूप में नहीं, बल्कि डॉलर की मजबूती के संदर्भ में देखा जाना चाहिए. हालांकि आलोचकों का मानना है कि रुपये में गिरावट के पीछे घरेलू आर्थिक नीतियां भी जिम्मेदार हो सकती हैं. विशेषज्ञों के अनुसार विदेशी निवेशकों का विश्वास कम होना और पूंजी का बाहर जाना भी रुपये पर दबाव डालता है.

महंगाई पर सीधा असर

जानकारों की मानें तो रुपये की गिरावट का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था और आम आदमी की जेब पर पड़ता है. भारत कच्चे तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स और सोने जैसे कई जरूरी सामानों का आयात करता है. डॉलर महंगा होने से इन वस्तुओं की लागत बढ़ जाती है, जिसका असर पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस और रोजमर्रा की चीजों की कीमतों पर दिखाई देता है. इसके अलावा बढ़ती महंगाई के कारण Reserve Bank of India (RBI) को ब्याज दरें बढ़ानी पड़ सकती हैं, जिससे होम लोन, ऑटो लोन और अन्य कर्ज महंगे हो जाते हैं. इसका असर मध्यम वर्ग और निम्न आय वर्ग पर सबसे अधिक पड़ता है.

वैश्विक कारण भी अहम

विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि वैश्विक घटनाएं जैसे युद्ध, कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और सप्लाई चेन में बाधाएं भी रुपये और महंगाई को प्रभावित करती हैं. हाल के भू-राजनीतिक तनावों के चलते कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है, जिससे महंगाई और बढ़ने की आशंका है. कच्चा तेल हजारों उत्पादों के निर्माण में इस्तेमाल होता है, जैसे प्लास्टिक, दवाइयां, कॉस्मेटिक्स और पैकेजिंग सामग्री. इसके महंगे होने से लगभग हर क्षेत्र में लागत बढ़ती है, जिसका असर अंतत उपभोक्ता पर पड़ता है.

आम लोगों की चिंता

रुपये की कमजोरी और महंगाई के संयुक्त प्रभाव से आम लोगों की क्रय शक्ति घट रही है. रोजमर्रा के खर्च, परिवहन लागत और खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ने से घरेलू बजट पर दबाव साफ दिखाई दे रहा है. आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में यदि वैश्विक और घरेलू परिस्थितियों में सुधार नहीं हुआ, तो महंगाई और रुपये की स्थिति दोनों ही आम जनता के लिए चुनौती बनी रह सकती हैं.

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