बिहार में जदयू के बिना नंबर गेम की तैयारी कर रही भाजपा..! क्यों हो रही बीजेपी के आत्मनिर्भर प्लान की चर्चा

bihar politics : बिहार की राजनीति इन दिनों एक बार फिर उबाल पर है. नीतीश के राज्यसभा जाने के बाद से फिलहाल तो सबसे बड़ा सवाल यही है कि राज्य का अगला मुख्यमंत्री कौन होगा? मौजूदा सियासी हलचलों के बीच इस चर्चा के साथ साथ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नए आवास को लेकर भी राजनीतिक संकेत तलाशे जा रहे हैं.

मुख्यमंत्री पद की रेस तेज

बिहार के अगले मुख्यमंत्री को लेकर राजनीतिक गलियारों में कई नामों की चर्चा है. जानकार यह दावा तो कर रहे कि मुख्यमंत्री भाजपा का होगा लेकिन सीधे तौर पर किसी का नाम लेने से बचते हुए भी दिख रहे. हालांकि मुख्यमंत्री पद की रेस में सम्राट चौधरी और नित्यानंद राय प्रमुख माने जा रहे हैं लेकिन अब तक किसी नेता ने खुलकर मुख्यमंत्री पद की दावेदारी नहीं जताई है. क्योंकि पार्टी से लेकर आम जन मानस तक यह चर्चा है कि अंतिम फैसला दिल्ली नेतृत्व द्वारा लिया जाएगा. इधर कई जानकार यह भी दावा कर रहे कि मुख्यमंत्री पद को लेकर 10 अप्रैल तक नाम की घोषणा संभव है.

बीजेपी का आत्मनिर्भर मिशन

बिहार की राजनीति में जब इतना सब कुछ हो रहा है तो एक चर्चा यह भी है कि नीतीश के राज्यसभा चले जाने से भाजपा अपने दम पर सरकार बनाने की तैयारी में है. बिहार विधानसभा की कुल 243 सीटों में बहुमत के लिए 122 सीटों की जरूरत होती है. मौजूदा स्थिति में:

  • बीजेपी: 89 विधायक
  • एलजेपी: 19 विधायक
  • हम: 5 विधायक
  • आरएलएम: 4 विधायक
  • जेडीयू: 85 विधायक

जदयू के बिना और एनडीए के साथ यह संख्या 117 तक पहुंचती है, जो बहुमत से सिर्फ 5 कम है. बीजेपी की रणनीति इस अंतर को पाटने और जेडीयू पर निर्भरता कम करने की बताई जा रही है. जिसके लिए पक्ष और विपक्ष में सेंध की कोशिश कर रही है.

विपक्ष में सेंध की कोशिश?

मीडिया सूत्रों के अनुसार कांग्रेस के कुछ विधायकों में असंतोष है. चर्चा है कि यदि 6 में से कम से कम 4 विधायक टूटते हैं, तो दलबदल कानून से बचा जा सकता है. ऐसे में बीजेपी के पास आंकड़ा 121 तक पहुंच सकता है. यानी बहुमत से सिर्फ एक सीट कम. इसके अलावा आरजेडी और अन्य दलों के विधायकों पर भी नजर बताई जा रही है. छोटे दलों और निर्दलीय विधायकों की भूमिका भी इस समीकरण में अहम हो सकती है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी अपने सहयोगी दलों को भी अपने साथ विलय के लिए प्रेरित कर सकती है, जिससे विधानसभा में उसकी ताकत और बढ़े. खासतौर पर छोटे घटक दल इस रणनीति का हिस्सा बन सकते हैं.

जेडीयू की भूमिका अब भी अहम

हालांकि बीजेपी आत्मनिर्भर बनने की कोशिश में है, लेकिन जेडीयू की भूमिका अभी भी महत्वपूर्ण बनी हुई है. केंद्र की राजनीति में भी जेडीयू का समर्थन जरूरी है, जिससे समीकरण और जटिल हो जाते हैं. ऐसे में राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बिहार में आने वाले दिनों में दल-बदल, गठबंधन और नेतृत्व परिवर्तन जैसे कई बड़े घटनाक्रम देखने को मिल सकते हैं. फिलहाल सबकी नजरें दो बातों पर टिकी हैं कि अगला मुख्यमंत्री कौन होगा
और क्या बीजेपी वाकई जेडीयू के बिना सरकार बनाने की स्थिति में पहुंचेगी.

 

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