Nitish kumar : मंगलवार 14 अप्रैल का दिन बिहार के लिए बड़ा दिन रहा. बिहार के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे नीतीश कुमार ने लगभग 20 वर्षों के कार्यकाल को अपने इस्तीफे के साथ समाप्त किया और अब वे राज्यसभा में जा रहे हैं.
1972 में बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में स्नातक की उपाधि प्राप्त करने वाले नीतीश कुमार ने पूर्णकालिक राजनीति में अपना जीवन समर्पित कर दिया. हालांकि 1985 तक उन्हें चुनावी सफलता नहीं मिली. यही वो साल था जब उन्होंने हरनौत से जीत हासिल की थी. इंडियन एक्सप्रेस में सीनियर असिस्टेंट एडिटर संतोष सिंह लिखते हैं कि अपने राजनीतिक दिनों की शुरुआत में बिहार के नालंदा जिले के हरनौत से 1977 के विधानसभा चुनाव हारने के कुछ समय बाद एक दिन नीतीश कुमार पटना के डाक बंगला चौक के पास एक कॉफी हाउस में पत्रकारों और बुद्धिजीवियों के साथ बैठे थे. इस दौरान एक बहस में मेज पर हाथ पटकते हुए उन्होंने दावा करते हुए कहा था कि वे एक दिन बिहार के मुख्यमंत्री बनेंगे. तब किसी ने नहीं सोचा होगा कि एक दिन नीतीश बिहार के राजनीति की पर्याय बन जाएंगें.
समाजवादी नेता के रूप में बनाई अपनी पहचान
1974 के जेपी आंदोलन से उभरे नीतीश को पहली जीत 1985 में मिली. जिसके बाद उन्होंने ने न सिर्फ समाजवादी नेता के रूप में अपनी पहचान बनाई बल्की अपनी स्थिति भी मजबूत की. हालांकि 1990 से 2005 तक बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद यादव का दबदबा होने के चलते बिहार की राजनीति में अपनी पहचान बनाने में उन्हें एक लंबा इंतजार करना पड़ा. इस दौरान नीतीश कुमार केवल 7 दिनों तक मुख्यमंत्री रहे. मुख्यमंत्री के रूप में उनका संक्षिप्त सात दिवसीय कार्यकाल 2000 में रहा था. जिसके बाद वो फिर 2005 में मुख्यमंत्री बने तो 2026 तक अपने 21 साल के लंबे कार्यकाल में 10 बार मुख्यमंत्री पद की शपथ और 6 बार इस्तीफा दिया. हालांकि बिहार की राजनीति में पिछले दो दशकों तक केंद्रीय भूमिका निभाने वाले नीतीश कुमार के शासनकाल को लेकर एक व्यापक बहस जारी है. जहां समर्थक इसे राज्य के कायाकल्प का दौर मानते हैं, वहीं आलोचक इसे अधूरा विकास बताते हैं.
सड़क से संस्थानों तक बुनियादी ढांचे का विस्तार
2005 में सत्ता संभालने के बाद नीतीश कुमार ने अपने पहले कार्यकाल (2005–2010) में सड़क और पुल निर्माण को प्राथमिकता दी. उस समय बिहार की पहचान जर्जर सड़कों और कमजोर कनेक्टिविटी से जुड़ी थी. राज्यभर में सड़क नेटवर्क के विस्तार ने आवागमन और आर्थिक गतिविधियों को गति दी. दूसरे कार्यकाल (2010–2015) में फोकस शिक्षा, स्वास्थ्य और प्रशासनिक ढांचे पर शिफ्ट हुआ. इस दौरान बड़ी संख्या में स्कूल, अस्पताल और सरकारी भवनों का निर्माण हुआ. इसी अवधि में कई प्रमुख वास्तु परियोजनाएं भी सामने आईं, जैसे बिहार संग्रहालय, सम्राट अशोक कन्वेंशन सेंटर, सरदार पटेल भवन (बिहार पुलिस मुख्यालय) और बापू टावर प्रमुख हैं. इन परियोजनाओं को आधुनिक बिहार की पहचान के रूप में प्रस्तुत किया गया.
विकास मॉडल पर सवाल
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि नीतीश सरकार में विकास मुख्यत संरचनात्मक स्तर तक सीमित रहा. आलोचकों के अनुसार राज्य में स्कूल भवन तो बने, लेकिन गुणवत्तापूर्ण शिक्षा संस्थान कम विकसित हुए, अस्पतालों की इमारतें बनीं, पर डॉक्टरों और संसाधनों की कमी बनी रही. उदाहरण के तौर पर राज्य के प्रमुख चिकित्सा संस्थान पटना मेडिकल कॉलेज और अस्पताल (PMCH), जो कभी देश के प्रतिष्ठित अस्पतालों में गिना जाता था, अब शीर्ष स्तर की प्रतिस्पर्धा में पिछड़ गया है. सरकार ने आर्यभट्ट ज्ञान विश्वविद्यालय और चाणक्य राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय जैसे संस्थान स्थापित किए, लेकिन शिक्षा के व्यापक मॉडल सुधार, जैसे सिमुलतला आवासीय विद्यालय मॉडल को राज्यव्यापी स्तर पर लागू नहीं किया जा सका.
कानून व्यवस्था नीतीश सरकार की बड़ी उपलब्धि
कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर नीतीश सरकार को व्यापक सराहना मिली. जहां लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी के दौर में जातीय हिंसा की घटनाएं आम थीं, वहीं नीतीश के शासन में बड़े पैमाने पर जातीय या सांप्रदायिक दंगों में कमी दर्ज की गई. स्थिति से निपटने के लिए सरकार ने कई पहल अपनाई जिसमें विशेष सहायक पुलिस (SAP) का गठन, दोषसिद्धि दर में सुधार और महिला पुलिसकर्मियों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि मुख्य पहलें रहीं.
सामाजिक न्याय की राजनीति का विस्तार
सामाजिक न्याय की राजनीति में नीतीश कुमार ने पूर्व नेताओं की विरासत को आगे बढ़ाया और कर्पूरी ठाकुर द्वारा शुरू किए गए आरक्षण मॉडल और लालू प्रसाद यादव द्वारा सामाजिक सशक्तिकरण के एजेंडे को उन्होंने योजनाओं के माध्यम से विस्तारित किया. इसके लिए नीतीश सरकार ने छात्राओं को साइकिल और ड्रेस, छात्रवृत्ति और फीस में छूट और अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC) और दलितों के लिए लक्षित कार्यक्रम जैसी मुख्य योजनाएं चालू की. इन पहलों से उनका सामाजिक आधार लव-कुश (कुर्मी-कोइरी) समूह से आगे बढ़कर व्यापक वर्गों तक फैल गया. नीतीश सरकार के नेतृत्व में महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में बिहार ने कई अग्रणी कदम उठाए.
- पंचायतों में 50% आरक्षण
- सरकारी नौकरियों में 35% आरक्षण
- जेंडर बजट लागू करने वाला पहला राज्य
इसके अलावा राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन को जीविका के रूप में पुनर्गठित किया गया, जिससे लगभग 1.8 करोड़ महिलाएं जुड़ीं. ये समूह आज ग्रामीण अर्थव्यवस्था, स्वच्छता अभियानों और सामुदायिक रसोई जैसे कार्यक्रमों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं.
गठबंधन राजनीति के माहिर खिलाड़ी
नीतीश कुमार को भारतीय राजनीति में गठबंधन प्रबंधन के एक अनूठे उदाहरण के रूप में देखा जाता है. 1996 में भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन से लेकर 2005 में सत्ता परिवर्तन तक, उन्होंने लगातार राजनीतिक समीकरणों को साधा. एक ऐसे नेता के रूप में, जो एक अपेक्षाकृत छोटे जातीय समूह (लगभग 2.8%) से आते हैं, उन्होंने दो दशकों तक बिहार की सत्ता पर प्रभाव बनाए रखा,यह भारतीय राजनीति में एक दुर्लभ उदाहरण माना जाता है.
विरासत पर क्यों हो रहा बहस
राजनीतिक विश्लेषकों द्वारा नीतीश कुमार की कंपेयर डॉ. श्रीकृष्ण सिंह और कर्पूरी ठाकुर से की जाती है. विश्लेषक कहते हैं कि जहां श्रीकृष्ण सिंह औद्योगिक और शैक्षणिक उत्कृष्टता के लिए जाने जाते हैं, वहीं नीतीश बुनियादी ढांचे तक सीमित रहे. कर्पूरी ठाकुर ने सामाजिक न्याय की शुरुआत की, और नीतीश ने उसे आगे बढ़ाया. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समान विद्यालय प्रणाली जैसी नीतियों को पूरी तरह लागू किया जाता, तो उनकी विरासत और अधिक मजबूत हो सकती थी. कुल मिलाकर नीतीश कुमार का शासनकाल बिहार के लिए परिवर्तन और सीमाओं का मिश्रण रहा. जहां उन्होंने राज्य को बुनियादी ढांचे, कानून-व्यवस्था और सामाजिक योजनाओं में नई दिशा दी, वहीं शिक्षा और स्वास्थ्य की गुणवत्ता जैसे क्षेत्रों में अपेक्षाएं पूरी तरह पूरी नहीं हो सकीं. उनकी राजनीतिक और प्रशासनिक विरासत पर बहस जारी है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि वे आधुनिक बिहार के सबसे प्रभावशाली नेताओं में से एक के रूप में याद किए जाएंगे.