fraud money recovery : भारत में डिजिटल पेमेंट फ्रॉड के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. पिछले पांच वर्षों में ऐसे मामलों में करीब 10 गुना वृद्धि दर्ज की गई है. जहां 2021 में लगभग 2.5 लाख मामले सामने आए थे, वहीं 2025 तक यह संख्या बढ़कर करीब 28 लाख हो गई. चिंताजनक बात यह है कि इन मामलों में ठगे गए पैसों का केवल लगभग 10% ही रिकवर हो पाता है.
डिजिटल फ्रॉड और अरेस्ट में क्या है अंतर?
डिजिटल पेमेंट फ्रॉड में ठग पीड़ित को धोखे से खुद पैसे ट्रांसफर करने के लिए उकसाते हैं, जैसे फेक निवेश योजनाएं, OTP स्कैम या किसी की पहचान बनकर बात करना. वहीं डिजिटल अरेस्ट में अपराधी खुद को पुलिस, CBI या ED अधिकारी बताकर वीडियो कॉल के जरिए मानसिक दबाव बनाते हैं और लंबे समय तक डराकर पैसे ट्रांसफर करवाते हैं. दोनों में तकनीक समान हो सकती है, लेकिन फर्क है मनोवैज्ञानिक रणनीति का.
पैसे ट्रेस करना मुश्किल क्यों?
जब किसी के खाते से पैसा निकलता है, तो वह सीधे एक जगह नहीं रुकता. यह कई चरणों में घूमता है जैसे पहले म्यूल अकाउंट (भाड़े के बैंक अकाउंट) में जाता है, फिर कई और अकाउंट्स में छोटे-छोटे हिस्सों में बांट दिया जाता है. और अंत में कैश निकाल लिया जाता है. इसके बाद इसे क्रिप्टोकरेंसी में बदल दिया जाता है या हवाला नेटवर्क के जरिए बाहर भेज दिया जाता है. इस पूरी प्रक्रिया में कुछ ही मिनट लगते हैं.
म्यूल अकाउंट क्या होते हैं?
म्यूल अकाउंट ऐसे बैंक खाते होते हैं जिनका इस्तेमाल अवैध पैसों को घुमाने के लिए किया जाता है. ये तीन तरह के हो सकते हैं. जैसे भाड़े पर दिए गए अकाउंट(पैसे के लालच में लोग अपना अकाउंट दे देते हैं),धोखे से इस्तेमाल किए गए अकाउंट (फर्जी जॉब या वर्क-फ्रॉम-होम के नाम पर) और फेक अकाउंट (चोरी के दस्तावेजों या नकली पहचान से खोले गए).
रिकवरी मुश्किल क्यों है?
डिजिटल फ्रॉड तेज ट्रांजैक्शन और धीमी रिपोर्टिंग के पैटर्न पर होता है. जैसे पीड़ित को अक्सर 2–6 घंटे लग जाते हैं यह समझने में कि उसके साथ फ्रॉड हुआ है. लेकिन पैसा 30–60 मिनट में ही सिस्टम से बाहर निकल सकता है, इसे ही गोल्डन आवर कहा जाता है. इसके अलावा इंटर-बैंक कोऑर्डिनेशन की कमी भी रिकवरी में दखल देता है. जैसे अगर पैसा एक बैंक से दूसरे बैंक में जाता है, तो हर बैंक सिर्फ अपना हिस्सा देख पाता है. पूरी ट्रांजैक्शन चेन किसी एक के पास नहीं होती. इसके साथ साथ छोटे-छोटे ट्रांजैक्शन के कारण भी दिक्कत होती है. दरअशल पैसे को कई हिस्सों में बांट दिया जाता है ताकि कोई एक ट्रांजैक्शन संदिग्ध न लगे.
सरकार और RBI क्या कर रहे हैं?
डिजिटल फ्रॉड को रोकने के लिए कई कदम प्रस्तावित या लागू किए जा रहे हैं. जैसे बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन के साथ सिम कार्ड जारी करना,सिम बेचने वाले एजेंट्स की जवाबदेही तय करना, संदिग्ध अकाउंट्स पर टेम्पररी डेबिट फ्रीज और WhatsApp जैसे प्लेटफॉर्म्स के लिए सख्त नियम लागू किए जा रहे. जैसे सिम-बाइंडिंग, डिलीट अकाउंट डेटा 180 दिन तक रखना, बैंकों के बीच बेहतर डेटा शेयरिंग और इंटेलिजेंस सिस्टम और सुप्रीम कोर्ट से यूनिफॉर्म गाइडलाइंस की मांग.आदि प्रमुख कदम उठाए गए हैं.
आप क्या करें?
अगर आपको लगता है कि आप साइबर फ्रॉड का शिकार हुए हैं, तो तुरंत 1930 हेल्पलाइन पर कॉल करें जितनी जल्दी रिपोर्ट करेंगे, रिकवरी की संभावना उतनी ज्यादा होगी. कुल मिलाकर सरकार डिजिटल सिस्टम ने ट्रांजैक्शन को आसान और तेज बनाया है, लेकिन यही गति अपराधियों के लिए भी फायदा बन गई है. जब तक रिपोर्टिंग, बैंकिंग कोऑर्डिनेशन और यूजर जागरूकता नहीं बढ़ती, तब तक पैसे की रिकवरी चुनौती बनी रहेगी.