Bihar Election : भारत के राजनीतिक इतिहास में बिहार एक अनोखी प्रयोगशाला रहा है। गौतम की यह वह भूमि रही जहाँ समाजवाद की गहरी जड़ें पड़ीं, और जयप्रकाश नारायण, जगन्नाथ मिश्र, लालू प्रसाद यादव जैसे नेताओं ने न केवल राज्य, बल्कि पूरे देश की राजनीति की दिशा बदली। पर आज सवाल यह उठता है ,क्या बिहार ने इन समाजवादी नेताओं से वास्तव में लाभ उठाया, या फिर यह राज्य इन सोशलिस्ट लीडर्स के प्रयोगों का खामियाजा भुगत रहा है?
सोशलिस्ट लीडर्स के नीतियों के चलते हाशिए पर बिहार?
जेपी आंदोलन ने देश को भ्रष्टाचार विरोधी चेतना दी, लोकतंत्र के लिए संघर्ष का रास्ता दिखाया, और आपातकाल के काले दिनों के खिलाफ जनमत खड़ा किया। वहीं लालू प्रसाद यादव ने सामाजिक न्याय की अलख जगाई, हाशिए पर खड़े पिछड़े और दलित वर्गों को सत्ता के केंद्र में लाया। नीतीश कुमार ने बाद में इसी धारा को विकास के साथ जोड़ने की कोशिश की। पर सच्चाई यह है कि इन आंदोलनों और नेताओं के प्रभाव के बावजूद, बिहार (Bihar Election ) का आर्थिक और सामाजिक विकास गंभीर रूप से बाधित रहा। 1990 के दशक में जब देश उदारीकरण की दौड़ में तेजी से आगे बढ़ रहा था, बिहार जातीय राजनीति और अफसरशाही के मकड़जाल में उलझा रहा। निवेशकों ने किनारा कर लिया, उद्योग बंद होते चले गए, शिक्षा और स्वास्थ्य ढांचों का पतन हुआ, और “जंगलराज” जैसी संज्ञा बिहार से जुड़ गई।
Bihar Election : बिहार ने विकास से किया समझौता?
क्या यदि बिहार को ये समाजवादी नेतृत्व नहीं मिला होता, तो तस्वीर अलग होती? इस प्रकार के प्रश्न का कोई एक उत्तर नहीं हो सकता जिसे आप रेखांकित कर सकें. संभव है कि सोशलिस्ट लीडर्स के कारण एक राजनीतिक संस्कृति जो विकास और कुशल प्रशासन को प्राथमिकता देती, वह बिहार को देश के अग्रणी राज्यों की कतार में ला सकती थी। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि बिहार की समस्याएँ महज राजनीतिक नहीं थीं। ऐतिहासिक तौर पर यह इलाका औपनिवेशिक शोषण, प्राकृतिक संसाधनों की कमी और ढांचेगत बाधाओं का शिकार रहा है। आज भी, जब बिहार धीरे-धीरे प्रगति की ओर कदम बढ़ा रहा है, तब भी उसके माथे पर अतीत की असफलताओं की छाया मौजूद है।
समाजवाद ने बिहार को सामाजिक चेतना दी लेकिन बिहार को इसकी कीमत विकास की रफ़्तार या फिर ये कहिए कि विकास के दूसरे सभी पहलुओं से समझौता करके चुकानी पड़ी।