Bihar free electric scheme : मीडिया की खबरों को अफवाह बताते हुए..महज चार दिन पहले ही राज्य के वित्त विभाग ने साफ शब्दों में खंडन करते हुए कहा था कि बिहार सरकार की 100 यूनिट मुफ्त बिजली देने की कोई योजना नहीं है। लेकिन 17 जुलाई की सुबह मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने आधिकारिक एक्स (पूर्व ट्विटर) हैंडल से यह जानकारी साझा की कि राज्य सरकार 1 अगस्त 2025 से 125 यूनिट मुफ्त बिजली देगी। जिसका एक मतलब तो यह निकाला जा ही सकता है कि सरकार के मुखिया भले नीतीश हों लेकिन सरकार में हो क्या रहा है इसकी ठीक ठीक जानकारी उन्हें भी नहीं है. इस मायने से तेजस्वी यादव का वो आरोप भी एक दम सही है , जब वो यह दावा करते हैं कि सरकार नीतीश कुमार नहीं कोई और चला रहा है. नीति और नियति के इस फर्क को आप इससे जोड़ सकते हैं कि सरकारी व्यवस्था में इतना अंधेरा है कि एक हाथ को दूसरे हाथ की खबर नहीं है…खैर
नीतीश कुमार इस तरह की राजनीति के आलोचक माने जाते रहे हैं… लेकिन अब अपने सियासी जीवन के उत्तरार्ध में वे उसी राह पर चल पड़े हैं तो नीतीश कुमार के इस फैसले ने एक बार फिर यह साफ कर दिया कि बिहार की सियासत अब रेवड़ी मॉडल की ओर तेजी से बढ़ रही है। 2020 के चुनावी वादे और फिर जब विधानसभा ने तेजस्वी यादव ने चुनावी मंच से 200 यूनिट मुफ्त बिजली का वादा किया तो नीतीश कुमार ने खुलकर इसकी आलोचना की. लेकिन अब नीतीश सरकार ने खुद 200 यूनिट नहीं तो 125 यूनिट मुफ्त बिजली की प्रभावी पेशकश की है। जिसको लेकर आलोचना और तारिफ तो हो ही रही है. लेकिन इस फैसले की आलोचना करने वाले दोहरी मानसिकता से ग्रसित नजर आते हैं।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि नीतीश कुमार का यह फैसला निश्चित रूप से ग्रामीण बिहार के लिए राहत लेकर आएगा। 125 यूनिट मुफ्त बिजली सीधे तौर पर गरीब और निम्न-मध्यमवर्गीय परिवारों को फायदा पहुंचाएगी तो शहरी क्षेत्र में भी यह आर्थिक बोझ को कुछ हद तक कम करेगा। पर सच्चाई यह भी है कि ये राहत राजनीतिक फायद का वो रास्ता है जिससे होते हुए नीतीश एक बार फिर से सत्ता तक पहुंचने का जुगाड़ कर रहे हैं. नीतीश कुमार की राजनीति की रीढ़ अब विकास से ज़्यादा वित्तीय सौगातों पर टिकी दिखती है। बीते कुछ दिनों में लिए गए बड़े फैसले जिसमे वृद्धावस्था पेंशन का विस्तार या अब यह मुफ्त बिजली ,हर फैसला आम लोगों की जेब पर सीधा असर डालने के साथ साथ उनके वोटों पर भी प्रभाव डालेगी.
जंगलराज बनाम सुशासन राज के अंतर पर शुरु हुई राजनीति अब रुक सी गई है. क्योंकि बिहार की राजनीति लंबे समय से दो ध्रुवों में बंटी रही है, लेकिन अब लगता है कि दोनों ही ध्रुव मुफ्तखोरी की राजनीति में एक हो चले हैं। क्योंकि एक तरफर जहां अपराध और बेरोजगारी जैसे मुद्दे पीछे छूटते जा रहे हैं तो वहीं वोटर का ध्यान बुनियादी समस्याओं से हटाकर तात्कालिक लाभों की ओर मोड़ा जा रहा है। इसे आप ऐसे समझें कि एक तरफ है गोलीबारी की खबर, है दूसरी तरफ बिजली के बिल माफ करने की घोषणाएं होती है. मतलब की आप जंगलराज बनाम सुशासन राज नहीं विकास के रेवड़ी मॉडल को चुनिए…125 यूनिट मुफ्त बिजली का यह ऐलान एक साथ तीन बातें करता है – जनता को आर्थिक राहत, विपक्ष के रेवड़ी मॉडल का रेवड़ी मॉडल से जवाब, और सत्ता में संतुलन होने का दिखावा। लेकिन क्या मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी और मुफ्त योजनाओं से बिहार की नींव मजबूत होगी? या यह सब महज “वोटबैंक इंजीनियरिंग” का हिस्सा बनकर रह जाएगा? इसका जवाब सरकार के पास ठीक उसी तरह नहीं है जैसा कि सरकार को ये नहीं मालूम है कि सरकार चला कौन रहा है….!