Mumbai Serial Blast 2006: 11 जुलाई 2006 की यह तारीख वो चुल्लू भर पानी है, जिसमें डूबकर भारत के न्यायिक सिस्टम को आत्महत्या कर लेनी चाहिए. संविधान में लिखी उस लाइन को हमेशा-हमेशा के लिए मिटा देना चाहिए, जिसके अर्थों में वो दावा करता है कि भले ही 100 दोषी बच जाए लेकिन एक निर्दोष को सजा नहीं मिले. भूमिका या अपनी बात कहने से पहले कहानी को खरोचते हैं ताकी जख्म भर जाने का दिखावा जिंदा न रहे…
वैसे तो भारतीय इतिहास में कई हादसों की एक लंबी लिस्ट है लेकिन 11 जुलाई 2006 की यह तारीख भारत और खासकर मुंबई के दिलों में एक दर्दनाक और भयंकर याद के रूप में दर्ज है। उस दिन मुंबई की वेस्टर्न सब अर्बन लाइन्स पर सात सिलसिलेवार बम धमाके हुए थे,जिसमें 189 निर्दोष लोगों की जान चली गई थी और 824 लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे। आकंड़े मीडिया रिपोर्ट की नहीं सरकारी है. हमले का लक्ष्य किसी खास व्यक्ति को निशाना बनाना नहीं था, बल्कि बेहद ही सुनियोजित तरीके से हुए इस हमले का मकसद भारतीय लोकतंत्र और उसके लोगों को भयभीत रखते हुए आतंक का परचम लहराना था. जिसमें हमलावर सफल रहें…लेकिन 19 साल बाद 21 जुलाई 2025 को बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस केस के सभी 12 आरोपियों को बरी कर भारत के लोकतंत्र और न्यायिक सिस्टम को हारा दिया.कोर्ट का कहना था कि सरकारी अभियोजन (प्रॉसीक्यूशन) आरोपियों के खिलाफ कोई ठोस सबूत पेश करने में विफल रहा और पेश किए गए दलीलों के अधार पर यह मानना मुश्किल था कि इन आरोपियों ने अपराध किया है। बॉम्बे हाईकोर्ट के इस फैसले को लेकर आप यह सोचने के लिए आजाद है कि हमारे देश की अदालत और जांच एजेंसियां कितनी कुंठित है. खैर ….
11 जुलाई 2006 को मुम्बई की लोकल ट्रेन में हुए इस सीरियल बम धमाके की घटना ने न केवल शहर बल्कि पूरे देश को झकझोर दिया था। सात ट्रेन कोचों में एक के बाद एक धमाके उन कोचों में हुए जो पहले क्लास में यात्रा कर रहे यात्रियों से भरे हुए थे। सोचिए अगर हादसे की जगह और इसका शिकार हुए लोग समाज के कतिथ संभ्रांत लोग होते तो… पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों ने इस हमले में शामिल आतंकवादियों का सुराग ढूंढने के लिए कई महीनों तक जांच की और फिर 2008 में 12 आरोपियों को गिरफ्तार किया। 12 आरोपियों के खिलाफ विभिन्न आतंकवादी संगठन के संबंधों, बम बनाने के उपकरणों और विस्फोटक सामग्री के साथ पकड़े जाने के आरोप भी लगाए गए, लेकिन सभी बे-बुनियाद….
मामले की सुनवाई कर रही निचली अदालत ने पांच आरोपियों को फांसी की सजा और सात को उम्रकैद की सजा सुनाई। 2015 में आया यह फैसला कोर्ट का पहला फैसला था. अदालत ने ये फैसला इस आधार पर दिया था कि आरोपियों का आतंकवादी गतिविधियों में संलिप्त होना साबित हो चुका था। लेकिन उस समय भी कई सवाल उठे थे कि क्या यह फैसला पूरी तरह से निष्पक्ष था या फिर किसी दबाव के चलते लिया गया था। नतिजन मामला पहुंचा बॉम्बे हाईकोर्ट…अब 2025 में 19 साल बाद बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस मामले में सभी आरोपियों को बरी कर दिया। कोर्ट ने यह कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ कोई ठोस और निर्णायक सबूत पेश करने में विफल रहा। कोर्ट ने यह भी माना कि जिन आरोपियों को सजा दी गई थी, उनके खिलाफ कोई प्रासंगिक और विश्वसनीय साक्ष्य नहीं हैं। अदालत ने यह आदेश भी दिया कि अगर इन आरोपियों का नाम किसी अन्य मामले में नहीं है,तो उन्हें तुरंत रिहा कर दिया जाए।
अब सवाल है कि क्या इस मामले में न्याय हुआ? क्या जो 189 परिवार आज भी अपने प्रियजनों को खोने का गम सह रहे हैं, उनके लिए यह फैसला सही है? क्या न्याय की प्रक्रिया ने इन निर्दोष लोगों की हत्या के असली कातिलों को नहीं बचाया है?….अगर इन सभी प्रश्नों के उत्तर हां में है तो न्यायिक व्यवस्था को चुल्लू भर पानी में डुब नहीं जाना चाहिए…यह मामला उस समय के न्यायिक और पुलिस व्यवस्था की कमजोरी को उजागर करता है। देश की सर्वोच्च न्यायिक प्रणाली पर सवाल उठाना आसान नहीं है लेकिन यह तथ्य है कि न्याय का कोई मतलब तब तक नहीं है जब तक दोषियों को सजा न मिले और निर्दोषों को बरी किया जाए।
किसी भी घटना की जांच में यह अहम होता है कि आरोपियों को सजा दिलाने के लिए ठोस साक्ष्य और गवाही प्रस्तुत की जाए। लेकिन इस मामले में यदि अभियोजन ने अपनी तरफ से सशक्त और विश्वसनीय साक्ष्य नहीं पेश कर पाया तो यह उसकी भी नाकामी है। 2006 से घटना के बाद से जो भी जांच एजेंसी या पुलिस इस मामले की जांच कर रही थी उसे भी खुद के गिरेबान में झांकना चाहिए। न्यायिक प्रक्रिया पर सवाल खड़ा कर रहा यह मामला पुलिस जांच की विश्वसनीयता को संदिग्ध बनाती है। यदि पुलिस और न्यायपालिका इतनी महत्वपूर्ण घटनाओं में साक्ष्य जुटाने में विफल रहती है तो क्या हम नागरिकों को सुरक्षा का भरोसा दे सकते हैं?
इस फैसले ने मुंबई हमले में मारे गए 189 लोगों के परिवारों को एक बार फिर उस दर्द को महसूस कराया है जो वे वर्षों से सहन कर रहे थे। यह उन निर्दोष लोगों की मौत पर एक गहरी चुप्प और ठंडी प्रतिक्रिया प्रतीत होती है। न्याय को केवल न्यायालय के निर्णय तक सीमित नहीं किया जा सकता, बल्कि न्याय को समाज के हर हिस्से में महसूस किया जाना चाहिए।
यह मामला हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हमारी न्याय व्यवस्था में दोषियों को सजा दिलवाना और निर्दोषों को बचाना सिर्फ तकनीकी प्रक्रिया बनकर रह गया है? यदि किसी मामले में न्याय करने की प्रक्रिया में कोई बड़ी कमी हो, तो क्या हम उसे नजरअंदाज कर सकते हैं? 19 साल बाद एक खौ़फनाक घटना के दोषियों का बरी होना समाज और न्याय व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गहरा सवाल खड़ा करता है। जब तक असली कातिल पकड़े नहीं जाते, तब तक न्याय की उम्मीद कितनी भी हो, वो हवा में ही लटकती रहती है।