Darbhanga nursing student death : हमारे सामाजिक ढांचे में कुछ सवाल इतने बुनियादी हैं कि उनके जवाब ढूंढना अब महज वैचारिक अभ्यास नहीं रह गया है,बल्कि यह आत्ममंथन का विषय बन गया है. इसी कड़ी में एक बड़ा प्रश्न है कि प्रेम बड़ा है या समाज? समाज बड़ा है या परिवार? परिवार बड़ा है या व्यक्ति? और अंत में फिर व्यक्ति बड़ा है या प्रेम? हम परिस्थितियों को अनदेखा कर दिया जाए तो इन प्रश्नों का कोई एक सीधा उत्तर नहीं है, लेकिन हाल की घटनाएं हमें इन सवालों की ओर बार-बार मोड़ रही हैं.
बीते दिनों सोशल मीडिया, टीवी और अखबारों में जिस तरह की खबरें छाई रहीं, उन्हें देखकर लगता है कि भारतीय समाज की जो बुनियादी संरचनाएं है वो आपस में ही टकरा रही हैं. जिसका नतीजा हो रहा है कि प्रेम, परिवार और समाज के बीच हो रहे असंतुलन को संतुलित करने के लिए न्याय की जो प्रक्रिया इस टकराव में निष्पक्ष रह पाने की कोशिश कर रही है,वो किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुंच पाती.
बिहार के दरभंगा मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल से जुड़ा एक मामला इस विमर्श का प्रत्यक्ष उदाहरण है. जहां प्रेम, विवाह, परिवार समाज और परिणाम सभी एक ही कहानी में गुथे हुए हैं. एक बेटी ने सामजिक दायरे को लांधकर प्रेम किया और अपने प्रेमी से विवाह किया, लेकिन यह विवाह उसके पिता को स्वीकार नहीं था. पिता ने अपने कथित सामाजिक और पारिवारिक मर्यादा का हनन होते देखा और फिर जब समाज द्वारा बार बार दिए जा रहे अपमान को सहते हुए थक गया तो दामाद की हत्या कर दी. विधवा बेटी जिसके पास ना तो अब उसका प्रेमी है और ना नहीं उसका परिवार, अपने ही पिता के खिलाफ खड़ी है. और यह सब देखते हुए समाज ठहाके लगा रहा है…
अब सवाल यह उठता है कि दोष किसका है? उस पिता का जिसने अपनी मान्यताओं को पहले तो दरकिनार किया लेकिन बाद में समाज को सर्वोपरि मानते हुए हिंसा का रास्ता चुना? या फिर उस बेटी का जिसने सामाजिक मान्यताओं को नकारते हुए पारिवारिक मर्यादा को लांघ कर प्रेम को चुना? या फिर उस समाज का जो आज तक यह निश्चित नहीं कर सका है कि प्रेम उसके लिए अपराध जैसा क्यों है…दरअसल समस्या यह नहीं कि कौन प्रेम में है और कौन नहीं…किसे मान्यता देनी है किसे नहीं…बल्कि बात ये है कि हमारा आपका समाज किस तरीके के प्रेम को वो सामाजिक रूप से स्वीकार करेगा.
प्रेम चुनने के लिए प्रेमी-प्रेमिका को किस हद तक परिवारिक मर्यादा और सामाजिक मान्यताओं को स्वीकार करने या नाकारने में ढील दी जाएगी…जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिल जाता…तब तक,जब भी प्रेम सामाजिक ढांचे के विरुद्ध जाएगा, परिवारों में दरारें पड़ती रहेगी, हत्याएं होती रहेगी और इन सब के बीच न्याय की प्रक्रिया उन टूटे हुए रिश्तों के बीच उलझता रहेगा .दरभंगा मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल से जुड़ा यह घटना सिर्फ एक आपराधिक मामला नहीं, बल्कि हमारे सामाजिक और नैतिक द्वंद्व का आईना है. समय आ गया है कि हम इन मूलभूत प्रश्नों से आंख न चुराएं. हमें तय करना होगा कि समाज किसकी रक्षा करेगा, उस प्रेम की जो स्वेच्छा से जन्म लेता है, या उस परंपरा की जो हिंसा के बल पर अपनी सत्ता बनाए रखना चाहती है.
दरभंगा मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में क्या हुआ इसके लिए पढ़िए ये रिपोर्ट…