राहुल-तेजस्वी की जोड़ी या ओवैसी फैक्टर करेगा खेल…सीमांचल में कौन बनेगा असली किंग?

Bihar Chunav 2025 :  बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की गहमागहमी ने पहले से ही राजनीतिक पारा चढ़ा दिया है. चुनावी अखाड़े में उतरने से पहले ही नेता अपने-अपने दांव चल रहे हैं, और इस बार सबसे बड़ा दांव सीमांचल पर खेला जा रहा है. पूर्णिया, कटिहार, अररिया और किशनगंज जैसे ज़िलों में फैला यह इलाका अब किंगमेकर नहीं, बल्कि किंग बनने को तैयार लग रहा है. राहुल गांधी और तेजस्वी यादव की वोटर अधिकार यात्रा इस बार सीमांचल में दस्तक दे चुकी है. सासाराम से शुरू हुई यह यात्रा अब मुस्लिम-ओबीसी बहुल इलाकों में जन समर्थन जुटा रही है. लेकिन सवाल है क्या भीड़ से सत्ता का रास्ता निकलेगा? क्या महागठबंधन की यह जोड़ी इस बार सीमांचल पर कब्जा जमा पाएगी? या फिर ओवैसी का फैक्टर एक बार फिर से सभी समीकरण बिगाड़ देगा?

देखा जाए तो सीमांचल बिहार की राजनीति में हमेशा से एक निर्णायक क्षेत्र रहा है, लेकिन अब इसकी अहमियत और बढ़ गई है. यहां की 40-45 विधानसभा सीटों में से अधिकांश सीटों पर मुस्लिम और पिछड़ा वर्ग निर्णायक की भूमिका में हैं. खासकर पूर्णिया, कटिहार, अररिया और किशनगंज के 24 विधानसभा सीटों में बहुजातीय और बहुधार्मिक सामाजिक ताना-बाना है, नतीजन इस इलाके में यादव, मुस्लिम, दलित, मल्लाह, कुशवाहा और अन्य पिछड़े वर्गों का मेल चुनाव परिणामों को तय करता है.

इस मयाने से राहुल गांधी की अगुवाई में सीमांचल पहुंची वोटर अधिकार यात्रा कांग्रेस के लिए संजीवनी बन सकती है. वर्षों से इस इलाके में कांग्रेस का जनाधार लगातार घट रहा था, जिसे पार्टी अब वह किसान, मजदूर और बेरोजगार युवाओं से सीधे जुड़कर अपने पुराने आधार को फिर से मजबूत करना चाहेगी और इसलिए भी आरजेडी के तेजस्वी यादव के साथ मिलकर कांग्रेस इस बार गैर-यादव पिछड़े, मल्लाह-निषाद और मुस्लिम वोट बैंक को साधने की कोशिश में है. जानकारों की मानें तो वर्तमान में महागठबंधन की ताकत यह भी है कि ये दल जातीय और सामाजिक संतुलन के साथ, बाढ़, बेरोजगारी, कृषि संकट, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली जैसे क्षेत्रीय मुद्दों को भी उठा रहे हैं. CPI-ML और अन्य वामपंथी दलों के साथ गठबंधन, खेत-मजदूर और भूमिहीन तबके के बीच पकड़ बढ़ाने में मददगार साबित हो सकता है.

2020 के चुनाव ने सभी को चौंका दिया था, जब असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM ने सीमांचल की 5 सीटें जीतकर यह दिखा दिया कि मुस्लिम वोट अब सिर्फ महागठबंधन की झोली में नहीं है. हालांकि बाद में AIMIM के 4 विधायक आरजेडी में शामिल हो गए, लेकिन इस पार्टी की मौजूदगी अब स्थायी हो चुकी है. किशनगंज, अररिया, कटिहार और फारबिसगंज जैसे क्षेत्रों में पार्टी का जनाधार लगातार बढ़ रहा है. ओवैसी की राजनीति का केंद्र मुस्लिम अस्मिता और सुरक्षा का सवाल है, जो इस क्षेत्र में खासा असर करता है. यदि AIMIM सीमांचल में 10-12% वोट काटने में सफल होती है, तो इसका सीधा नुकसान महागठबंधन को हो सकता है. यही कारण है कि कांग्रेस और आरजेडी की जोड़ी हर हाल में मुस्लिम वोटों को एकजुट रखने के लिए सीमांचल में सक्रिय हुई है.

एनडीए, विशेष रूप से भाजपा, सीमांचल में अभी भी काफी हद तक पिछड़ती रही है, लेकिन 2020 में इसने कुछ महत्वपूर्ण सीटें जीतकर यह दिखाया कि उच्च जातियों के साथ कुछ ओबीसी और यहां तक कि मुस्लिम महिलाओं के बीच भी इसकी पैठ बन रही है. नीतीश कुमार की योजनाओं, विशेषकर महिला सशक्तिकरण और आवास योजनाओं के चलते भाजपा-जेडीयू गठबंधन को सीमांचल में सीमित लेकिन ठोस समर्थन प्राप्त है. लेकिन अब जबकि नीतीश फिर से पाला बदल चुके हैं और PK की जन सुराज पार्टी भी मैदान में उतर रही है, एनडीए के सामने एक नई चुनौती है अपनी पुरानी स्थिति बनाए रखना और नए मतदाताओं को जोड़ना.

उधर राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर की पार्टी ‘जन सुराज’ भले ही अभी पूरी तरह परिपक्व न दिखे, लेकिन सीमांचल में वह उन मतदाताओं को अपील कर रही है जो पारंपरिक राजनीति से ऊब चुके हैं. PK की पार्टी विकास और प्रशासनिक पारदर्शिता की बात करती है, जो युवा और शहरी मतदाताओं को आकर्षित कर सकती है. अगर जन सुराज सीमांचल में 3-5% भी वोट काट लेती है, तो वह किसी भी गठबंधन के लिए खेल बिगाड़ सकती है.

इन चीजों को देखें तो सीमांचल 2025 में सिर्फ एक क्षेत्र नहीं, बल्कि पूरे चुनाव की दिशा तय करने वाला सबसे महत्वपूर्ण इलाका बन सकता है. जाति, धर्म, विकास, अस्मिता और नेतृत्व की विश्वसनीयता के कारण यहां की सियासी जमीन पर कई परतें हैं. अगर महागठबंधन का सामाजिक समीकरण और राहुल-तेजस्वी की जोड़ी लोगों को विश्वास दिलाने में सफल रही, तो यह इलाका उनके पक्ष में जा सकता है और अगर AIMIM मुस्लिम वोटों को छीनने में सफल हुई, तो यह सीधे-सीधे महागठबंधन को नुकसान पहुंचाएगा और एनडीए को अप्रत्याशित लाभ मिल सकता है. इन सबके बीच PK की जन सुराज पार्टी सीमांचल में वोटों का ध्रुवीकरण रोकने में सफल हुई, तो पूरा चुनाव त्रिकोणीय बन सकता है.

बिहार विधानसभा चुनाव से पहले सीटों के बंटवारे में उलझी NDA की  सियासत ?

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