खजौली में बदलते सियासी समीकरणों के बीच 2025 में दिलचस्प मुकाबला

Bihar Chunav:  मधुबनी जिले के दो प्रखंड जयनगर और बसोपट्टी प्रखंडों के साथ-साथ खजौली प्रखंड की सात ग्राम पंचायतें खजौली विधानसभा का हिस्सा है, यह क्षेत्र झंझारपुर लोकसभा सीट के तहत आता है. आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियाँ तेज हो गई हैं. मुस्लिम और यादव बहुल इलाके में एनडीए का पलड़ा भारी रहता है…

लेकिन शर्त ये है कि जदयू साथ रहे. मौजूदा विधायक अरुण शंकर प्रसाद एक बार फिर यहां से प्रत्यासी हो सकते हैं, लेकिन उनके खिलाफ जनता में काफी ज्यादा आक्रोश है. हालांकि जमीनी स्तिथि को देखते हुए ऐसी चर्चा है कि अरुण शंकर प्रसाद मधुबनी विधानसभा से उम्मीदवार हो सकते हैं. लेकिन इसमें एक दिक्कत ये है कि फिलहाल यह मधुबनी सीट भाजपा के खाते में नहीं है. अगर सीट बंटबारे के समय यह भाजपा के हिस्से आती है तो अरुण शंकर प्रसाद के उम्मीदवार होने की प्रबल संभवाना है.

वर्तमान विधायक के खिलाफ मतदाताओं में नाराजगी और आरजेडी के नेता सिता राम यादव का बार फिर सक्रिय होकर क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करने का प्रयास करना, यह क्षेत्र भाजपा के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है. खजौली सीट पर भी मुकाबला दिलचस्प होने की संभावना है. विपक्ष से प्रदीप प्रभाकर और वीरेन्द्र यादव प्रबल दावेदार हैं. राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि भाजपा इस सीट पर चुनाव मैदान में जाती है, तो उनकी स्थिति काफी चुनौतीपूर्ण हो सकती है. वहीं रुपम कुमारी भी सक्रिय हैं और जनसुराज द्वारा उनके प्रत्याशी बनाने की स्थिति में महागठबंधन को काफी नुकसान हो सकता है. इसके अलावा, इस क्षेत्र में दो से तीन और दावेदार भी अपने पैनापन को लेकर चर्चाओं में हैं.

अब तक हुए 17 विधानसभा चुनावों में खजौली ने मिश्रित नतीजे रहे हैं. कांग्रेस पार्टी ने यहां सबसे ज्यादा छह बार जीत दर्ज की है, जिनमें शुरुआती तीन चुनावों में लगातार जीत शामिल रही. 1967 और 1969 में प्रजा समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस का विजय रथ रोक दिया. भाकपा और राजद को दो-दो बार सफलता मिली, जबकि 1977 में जनता पार्टी ने सीट पर कब्जा जमाया. 1952 से 1972 तक खजौली सामान्य सीट रही. 1977 में यह अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हो गई और 2005 तक यही स्थिति रही. परिसीमन आयोग की सिफारिशों के बाद 2010 में यह फिर से सामान्य सीट बन गई. भाजपा खजौली में कांग्रेस के बाद सबसे सफल दल रही है. पार्टी ने अब तक चार बार जीत दर्ज की है 2005 में हुए दोनों चुनावों में और 2010 में लगातार जीत हासिल की. हालांकि 2015 में जब जेडीयू राजद के साथ गठबंधन में था, तो भाजपा यह सीट हार गई और राजद के सीताराम यादव विधायक बने. लेकिन 2020 में भाजपा ने वापसी की और अरुण शंकर प्रसाद ने राजद के सीताराम यादव को 22,689 वोटों से हराया.

जेडीयू ने भले ही अब तक खजौली से सीधा चुनाव नहीं जीता हो, लेकिन इसका प्रभाव यहां साफ दिखता है. भाजपा की चारों जीत जेडीयू के साथ गठबंधन में ही हुईं. जब जेडीयू राजद के साथ गया, भाजपा हार गई. लोकसभा चुनावों में भी जेडीयू का खजौली में मजबूत आधार रहा है.खजौली मिथिला क्षेत्र में स्थित है, जो अपनी उपजाऊ मैदानी जमीन के लिए प्रसिद्ध है. यहां बहने वाली कमला बलान और बछराजा नदियां हर साल बाढ़ की समस्या लेकर आती हैं. क्षेत्र में मुख्यतः धान, गेहूं और दालें उगाई जाती हैं, लेकिन सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था न होने के कारण खेती मानसून पर निर्भर रहती है. बुनियादी ढांचा, सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा के मामले में यह क्षेत्र अब भी पिछड़ा हुआ है. रोजगार की कमी के चलते यहां के युवाओं का पलायन आम बात है.

सीमा-वरती इलाकों में अपराध, तस्करी और नेपाल के बाजार पर निर्भरता प्रमुख चिंता का विषय बने हुए हैं. जयनगर और अन्य बाजारों में लगभग 70 प्रतिशत उपभोक्ता नेपाल से आते हैं, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव पड़ता है. विकास की दृष्टि से क्षेत्र में रोजगार, ग्रामीण सड़कें, पेयजल, स्वास्थ्य सुविधाएँ और अन्य मूलभूत समस्याएँ मुख्य मुद्दा बनी हुई हैं. बसोपट्टी और खजौली में कोई भी बड़ा शिक्षा संस्थान नहीं है, जिससे युवा वर्ग में असंतोष है. इन सबके अलावा विशेषज्ञों का मानना है कि चुनाव में जातिगत समीकरण भी एक महत्वपूर्ण फैक्टर होंगे. उम्मीदवारों की जातिगत पृष्ठभूमि और क्षेत्रीय जनसमूहों की प्रतिक्रिया का चुनाव परिणाम पर सीधा असर पड़ सकता है. कुल मिलाकर खजौली विधानसभा में चुनावी तैयारी, उम्मीदवारों की गतिविधियाँ और स्थानीय मुद्दे आगामी विधानसभा चुनाव के लिए सियासी परिदृश्य को काफी हद तक निर्धारित करेंगे.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *