महागठबंधन का गढ़ मखदूमपुर, एनडीए की नई चुनौती या फिर से हार?

Bihar assembly election 2025: बिहार के राजनीतिक नक्शे पर मखदुमपुर विधानसभा क्षेत्र इन दिनों काफी सुर्खियों में बना हुआ है. जहानाबाद जिले की इस अनुसूचित जाति आरक्षित सीट पर चुनावी गतिविधियां अपने चरम पर है. वर्तमान विधायक सतीश कुमार के गढ़ को चुनौती देने के लिए विभिन्न राजनीतिक दल अपनी अपनी रणनीति पर काम कर रही है. जिले के सभी सीटों पर राजनीतिक दलों द्वारा चुनावी कार्यक्रम जारी है, और गठबंधनों में आए बदलाव के कारण मुकाबले और भी दिलचस्प हो सकता है.

पहाड़ोंकी छाया में राजनीति खेल

महाभारत काल में ‘गोरख गिरी’ के नाम से प्रसिद्ध बराबर पहाड़ी अब चुनावी रणनीतियों का गवाह बन चुकी है. पर्यटकों को आकर्षित करने वाली इन प्राचीन गुफाओं के आसपास अब चुनावी सभाओं की गूंज सुनाई दे रही है. यहां की पहाड़ियां पर्यटकों को बेहद आकर्षित करती है. यहां की धार्मिक जनसंख्या की बात करें तो यहां हिंदुओं की संख्या लगभग 93% है जबकि मुस्लिम आबादी केवल 6.57 प्रतिशत है यह जनसंख्या संरचना चुनावी रणनीतियों को प्रभावित करती है.

चुनवा का इतिहास

मखदुमपुर सीट का चुनावी इतिहास काफी दिलचस्प है. क्योंकि, अब तक हुए 17 चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने यहां सबसे अधिक सात बार जीत हासिल की है. हालांकि उसकी आखिरी जीत 1990 में आई थी. राष्ट्रीय जनता दल ने चार बार सफलता पाई जबकि जनता दल (यूनाइटेड) और लोक जनशक्ति पार्टी ने एक-एक बार जीत दर्ज की है. इस सीट पर एक बार निर्दलीय उम्मीदवार ने भी जीत हासिल की है. संयुक्त समाजवाद पार्टी जनता पार्टी और जनता दल ने भी एक-एक बार सफलता पाई है.

पिछले 2 विधानसभा चुनाव के नतीजे

पिछले दो चुनाव के नतीजे के बारे में बात करें तो मखदुमपुर सीट पर महागठबंधन का दबदबा बना रहा 2015 में जनता दल यूनाइटेड के उम्मीदवार की जीत हुई थी. जबकि, 2020 में राजद के सतीश कुमार ने जीत हासिल की थी दोनों बार एनडीए के उम्मीदवार को हर का सामना करना पड़ा जो इस सीट पर महागठबंधन की मजबूत पकड़ को दर्शाता है.
जहां 2015 में सूबेदार दास (राजद) ने कुल 26,777 वोटो से जीतन राम मांझी (हम) को हराया था. वही 2020 में राजद उम्मीदवार सतीश कुमार ने 49,006 वोटो के बड़े मार्जिन से हम के देवेंद्र कुमार को हराया था.

क्या होगा 2025 समीकरण और चुनौतियां

इस बार की सबसे बड़ी बात यह है कि पिछली बार राजद के खिलाफ उम्मीदवार उतारने वाली चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) अब एनडीए का हिस्सा है. यह गठबंधन परिवर्तन चुनावी समीकरणों को बदलने में मदद कर सकती है वही प्रशांत किशोर की नई पार्टी जनसुरज का चुनावी मैदान में उतरना एक नया आयाम जोड़ता है. निर्दलीय उम्मीदवार भी मुकाबला को और दिलचस्प बनाने की तैयारी में जुटे हुए हैं. यदि किसी बड़ी पार्टी से बागी उम्मीदवार चुनाव लड़ते हैं तो स्थिति और भी जटिल हो सकती है.

मखदुमपुर विधानसभा सीट पर आगामी चुनाव कई मायनों में निर्णायक साबित हो सकते हैं. कांग्रेस के पारंपरिक गढ़ में वापसी की संभावनाएं प्रशांत किशोर की पार्टी का प्रभाव और स्थानीय मुद्दों का महत्व यह सभी मिलकर इस सीट के चुनावी परिणाम को रोचक बना रहे हैं. अब अंतिम फैसला मतदाताओं का है, वह किस दिशा में अपना वोट देंगे.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *