Bihar chunav : बिहार में चुनावी मौसम है, तो सवालों का दौर भी तेज है. जीत और हार दोनों के अपने मायने हैं, लेकिन राजनीति में जीत ही सब कुछ मानी जाती है, और जीत एक बार नहीं, हर बार चाहिए होता है. यही राजनीति और राजनेताओं की प्राथमिकता होती है. लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि जनता की प्राथमिकता क्या होती है?
जब जमीन पर उतरकर मतदाताओं से बात कीजिए तो जो सच्चाई छनकर सामने आती है, वह होती कुछ और है दिखती कुछ और. लोगों की पहली पसंद होती है कि उम्मीदवार उनकी जाति का हो, स्थानीय हो, और अगर विचारधारा से मेल खाता हो तो सोने पर सुहागा. क्योंकि जो हालात है उससे यह तो साफ है कि उनके मन में यह तस्वीर साफ होती है कि काम तो होने वाला नहीं चलो जातिवाद से ही काम चला लेते है. नतीजा यह तीन सूत्र आज भी राजनीति की सबसे टिकाऊ रणनीति बने हुए हैं.
लेकिन यहां एक बड़ा विरोधाभास भी छिपा है. जनता की असली ज़रूरतें ,शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सुरक्षा और साफ हवा-पानी इन सबका स्थान चुनावी बहस में सबसे पीछे होता है. हर बार जब चुनाव आता है, तो राजनेता जनता को यह समझाने की कोशिश करते हैं कि उनकी ज़रूरतें उतनी अहम नहीं हैं. वे यह बताते हैं कि धर्म, जाति या विचारधारा को बचाना ज्यादा जरूरी है.इस तरह जनता को मुद्दों से भटकाकर, राजनीति का केंद्र भावनाओं में बदल दिया जाता है. और यह खेल चुनाव दर चुनाव जारी रहता है.
कहते हैं, सरकार जनता के लिए होती हैं. लेकिन सच्चाई यह है कि सरकार किसी की नहीं होतीं न जनता की, न विचारधारा की. अब उदाहरण के लिए दिल्ली में प्रदूषण का मुद्दा ही देखिए. जब तक सत्ता में नहीं थी, बीजेपी ने आम आदमी पार्टी की सरकार को प्रदूषण के लिए कोसा. लेकिन जब खुद सत्ता में आई, तो वही हाल, हिंदू हो या मुसलमान, सबके लिए हवा जहरीली ही है. हर साल प्रदूषण पर बहस होती है, अपीलें होती हैं, मगर पटाखे बनाने वाली कंपनियां अरबों का कारोबार कर रही हैं. और यकीन मानिए, इस कारोबार में सबका फायदा होता है ,कंपनियों का भी, और सरकार का भी. यानी जो उद्योग जनता की सेहत बिगाड़ रहा है, वह सरकार की आमदनी का स्रोत भी बना हुआ है. और जनता? वह इस सबकी कीमत चुकाने को मजबूर है ,अपने फेफड़ों से, अपनी साँसों से.
लेकिन राजनीति का यह दोहरापन यहीं नहीं रुकता. जब बिजली, सड़क या स्वास्थ्य की बात उठती है, तो नेता विकास का वादा करते हैं. लेकिन चुनावी मंचों पर वही पुराने नारे जाति, धर्म, और हम बनाम वो फिर लौट आता है और जनता भी इन नारों में उलझ जाती है, और अपनी मूल प्राथमिकताओं को पीछे छोड़ देती है. इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि इस बार कौन जीतेगा या कौन हारेगा. असली सवाल यह है कि क्या जनता की प्राथमिकता कभी सरकार की प्राथमिकता बनेगी? क्या जनता की जरूरतें राजनीति और कारोबार से ऊपर उठ पाएंगी?