बिहार भाजपा में सब कुछ ठीक ? शाह की नाराजगी से मिथिलांचल के इन नेताओं पर गिरेगी गाज..!

Bihar election: बिहार की राजनीति इस समय अपने सबसे निर्णायक दौर में प्रवेश कर चुकी है। विधानसभा चुनाव 2025 में अब कुछ ही महीने शेष हैं और सभी दल अपने-अपने पत्ते खोलने लगे हैं। इस बार की सबसे बड़ी सुर्खी बीजेपी के भीतर टिकट वितरण और नेतृत्व की सख्त रणनीति को लेकर है। गृह मंत्री और बीजेपी के वरिष्ठ नेता अमित शाह के हालिया बिहार दौरे ने पार्टी के भीतर हलचल मचा दी है।

मिली जानकारी के अनुसार, अमित शाह ने प्रदेश नेतृत्व के साथ कई दौर की मैराथन बैठकें कीं। इन बैठकों में न केवल चुनावी रणनीति पर विचार-विमर्श हुआ, बल्कि कई दिग्गज नेताओं को कड़े संदेश भी दिए गए। कहा जा रहा है कि शाह ने टिकट बंटवारे में किसी भी प्रकार की लापरवाही न बरतने की हिदायत दी है। पार्टी के भीतर अनुशासनहीनता और गुटबाजी को लेकर भी उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी।

भाजपा की अंदरूनी बैठकों से जो संकेत बाहर आए हैं, वे साफ करते हैं कि इस बार पार्टी अपने मौजूदा विधायकों पर भी तरजीह के बजाय विनेबिलिटी को प्राथमिकता दे रही है। बताया जा रहा है कि लगभग 15 से 18 सीटिंग विधायकों के टिकट पर संकट गहरा गया है। इनमें वे नेता शामिल हैं, जिन पर पार्टी विरोधी गतिविधियों में संलिप्त रहने का आरोप है या क्षेत्र में उनके प्रति जनता में आगोश है..  इतना ही नहीं, 70 वर्ष से अधिक उम्र पार कर चुके और लंबे समय से सक्रिय राजनीति में सुस्त पड़े नेताओं का भी टिकट कटने जा रहा है.

भाजपा की रणनीति बूथ स्तर की मजबूती और स्थानीय कार्यकर्ताओं की सक्रियता पर केंद्रित है। पार्टी मानती है कि 2020 के विधानसभा चुनाव में जहां वह बेहद कम अंतर से हारी या जीती, वहां की स्थिति का गंभीर विश्लेषण जरूरी है। बता दें कि 2020 में छह ऐसी सीटें थीं, जहां जीत और हार का अंतर महज तीन हजार वोटों से कम था। आठ सीटों पर यह अंतर दो हजार वोटों से भी कम रहा। जबकि 13 सीटों पर भाजपा के उम्मीदवार 11 हजार से अधिक वोटों के अंतर से हारे थे। इन सीटों पर अब नए उम्मीदवारों को मौका देने की संभावना प्रबल है। इसके साथ साथ भाजपा इस बार मध्य प्रदेश चुनाव मॉडल को अपनाने पर भी विचार कर रही है।

इसका अर्थ है कि पार्टी मौजूदा विधायकों के बजाय पूर्व सांसदों या क्षेत्र में बेहतर पहचान रखने वाले नए चेहरों को टिकट दे सकती है। साथ ही, महिलाओं और युवाओं को बड़े पैमाने पर मैदान में उतारने की योजना भी सामने आ रही है।

माना जा रहा है कि शाह ने सीमांचल और मिथिलांचल क्षेत्रों में पार्टी की कमजोर पकड़ को लेकर भी चिंता जताई है। इन इलाकों में बूथ स्तर पर संगठन को मजबूत करने और कार्यकर्ताओं की सक्रियता बढ़ाने पर जोर दिया गया है। बैठकों के दौरान पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं को उनकी कार्यशैली और कमजोर प्रदर्शन को लेकर फटकार भी लगाई गई। पार्टी के आंतरिक सर्वे में लगभग दो दर्जन से अधिक विधायकों की नकारात्मक छवि सामने आई है.

बीजेपी के सामने इस बार की चुनौती केवल आंतरिक कलह और टिकट वितरण तक सीमित नहीं है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी की बिहार में वोटर अधिकार यात्रा भाजपा के लिए सिरदर्द बन रही है। खास कर सीमांचल और मिथिलांचल के कई हिस्सों में कांग्रेस और महागठबंधन की पकड़ मजबूत हुई। यही वजह है कि भाजपा नेतृत्व इन क्षेत्रों में उम्मीदवार चयन को लेकर और भी सतर्क है। जानकारी के अनुसार मधुबनी जिले के 2 सीट राजनगर और बेनीपट्टी तथा दरभंगा के अलीनगर सीट से मौजूदा विधायक का पत्ता कट सकता है. इसके अलावा पार्टी सीटों का फेरबदल भी कर सकती है.

कुल मिलाकर इस बार भाजपा ने स्पष्ट कर दिया है कि चुनाव में किसी भी प्रकार की भावनात्मक या परंपरागत राजनीति को प्राथमिकता नहीं दी जाएगी। हर उम्मीदवार का मूल्यांकन उसकी जीत की क्षमता पर होगा। क्योंकि बिहार में परिणाम का असर केवल राज्य तक सीमित नहीं रहेगा।

इसके नतीजे पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश की राजनीति पर भी दूरगामी प्रभाव डाल सकते हैं। ऐसे में अमित शाह की सख्त नीति और टिकट वितरण में पारदर्शिता व जीत की क्षमता पर जोर भाजपा की चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा बन गया है।

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