प्रशांत किशोर के निशाने पर नीतीश…इस मामले में विपक्ष से भी नाराज़गी !

Bihar Election: बिहार की सियासत इन दिनों प्रशांत किशोर के इर्द-गिर्द घूमती नज़र आ रही है. सियासी चालों के माहिर माने जाने वाले पीके ने इस बार कोई चुनावी मैनेजमेंट नहीं, बल्कि मैदान में खुद मोर्चा संभाल रखा है.

विपक्ष और सरकार पर हमलावर प्रशांत बिहार विधानसभा में तीसरे खेमें की तैयारी में है. लेकिन दिलचस्प यह है कि वे सीधे नीतीश कुमार पर वार करने से बच रहे हैं, और उनकी सरकार और सहयोगियों की मुश्किलें बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे. बीते कुछ हफ्तों में पीके ने लगातार भाजपा और जदयू) के दिग्गज नेताओं पर निशाना साधा है.

भाजपा के सम्राट चौधरी, दिलीप जायसवाल और मंगल पांडे पर उन्होंने दस्तावेजों के साथ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए. मगर सबसे बड़ा सियासी धमाका तब हुआ जब उन्होंने नीतीश के भरोसेमंद मंत्री और खुद को उनका मानस पुत्र कहने वाले अशोक चौधरी पर 200 करोड़ रुपये की संपत्ति जुटाने का आरोप ठोक दिया.

पीके के इन खुलासों से बिहार की सत्ता गलियारों में खलबली मच गई है. चौधरी न तो इन आरोपों का ठोस जवाब दे पाए, न ही अपनी सफाई में भरोसा जगा पाए. उलटे अब वे नीतीश कुमार, अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सफाई मांगते दिख रहे हैं. पीके इसे ही अपने दावों की जीत मान रहे हैं. हालांकि इस पूरे घटनाक्रम में एक और दिलचस्प पहलू है, कि भले पीके नीतीश सरकार को सबसे भ्रष्ट बता रहे हो, पर चिराग पासवान की तारीफ करने से नहीं चूक रहे.

इन खुलासों के बीच भाजपा की असहजता तब और बढ़ गई जब पूर्व केंद्रीय मंत्री आर.के. सिंह ने भी पीके के आरोपों पर स्पष्टीकरण मांगा. इससे साफ है कि पीके सत्तारूढ़ गठबंधन को किनारे से नहीं, बल्कि अंदर से झकझोरने की कोशिश कर रहे हैं. ये तो हुई सरकार की बात…वहीं अगर जिक्र करें विपक्ष की तो पीके की राजनीति का निशाना सिर्फ सत्ता पक्ष नहीं है.

वे विपक्ष को भी छोड़ नहीं,  प्रशांत कहते हैं कि बिहार की राजनीति में विपक्ष जनता को ठोस विकल्प देने में नाकाम रहा है. वे कहते हैं कि विपक्ष ने जनता के मुद्दों की बजाय जातीय समीकरणों को अपना आधार बना लिया है और बदलाव की बात करने वालों को पहले खुद बदलना होगा. कभी कांग्रेस और फिर आरजेडी के साथ काम कर चुके पीके का आरोप है कि बिहार में विपक्ष भ्रष्टाचार और सुशासन के सवाल पर साफ एजेंडा पेश नहीं कर पा रहा.

बिहार की राजनीति में यह मंजर उस गहरे उबाल की तरफ इशारा करता है, जिसमें चुनाव से पहले की ज़मीन पर नए समीकरण बनने-बिगड़ने की आहट सुनाई दे रही है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *