बाबूबरही की राजनीति बदलेगी चाल ? सियासत से विकास, रोजगार और बाढ़ का सवाल

Babubarhi vidhan sabha: बिहार के मधुबनी ज़िले की बाबूबरही विधानसभा सीट हमेशा से सियासी हलचल के केंद्र में रही है। सीमावर्ती इलाक़े में होने के कारण न केवल राजनीति बल्कि सामाजिक, आर्थिक और विकास से जुड़े सवालों के लिहाज़ से भी यह सीट विशेष महत्व रखती है बल्कि बागमती और कमला जैसी नदियों की बाढ़, पलायन, रोज़गार की कमी और बदहाल स्वास्थ्य सुविधाएं यहां के मतदाताओं के लिए आज भी गंभीर मुद्दे बने हुए हैं। बावजूद इसके, चुनावी समर में  जातीय समीकरण और दलगत रणनीतियां ही हावी नजर आती हैं।

जानकारी के बता दें कि  बाबूबरही और लदनियां प्रखंडों के साथ खजौली प्रखंड की सात ग्राम पंचायतों से मिलकर बना यह बाबूबरही विधानसभा सीट वर्ष 1977 में लदनियां विधानसभा क्षेत्र के विघटन के बाद अस्तित्व में आई। तब से अब तक यहां 12 विधानसभा चुनाव हो चुके हैं, जिनमें 2003 का उप चुनाव भी शामिल है। बाबूबरही, झंझारपुर लोकसभा सीट के छह विधानसभा क्षेत्रों में से एक है। राजनीतिक दृष्टि से बाबूबरही का इतिहास उतार-चढ़ाव भरा रहा है। देखा जाए तो यहां किसी एक दल की स्थायी पकड़ कभी नहीं बन सकी। लेकिन अब तक हुए चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने चार बार, जनता दल (यूनाइटेड) ने तीन बार, कांग्रेस और पूर्ववर्ती जनता दल ने दो-दो बार तथा 1977 में जनता पार्टी ने जीत दर्ज की है। इस सीट की सियासी पहचान को गढ़ने में दिवंगत नेता देव नारायण यादव की भूमिका अहम रही। वे बिहार की पहली मंत्रिपरिषद के सदस्य रहे और 1995 से 2000 तक विधानसभा अध्यक्ष पद पर रहे। उन्होंने बाबूबरही से चार बार चुनाव जीता.

 

हाल के वर्षों में जदयू ने यहां अपनी स्थिति मजबूत की। 2015 में कपिल देव कमत की जीत और 2020 में उनकी बहू मीना कुमारी की जीत ने पार्टी को स्थानीय राजनीति में बढ़त दिलाई। 2020 में, इस सीट से पहले तीन बार विजयी रह चुके मीना कुमारी ने राजद के उमाकांत यादव को 11,488 वोटों से हराया। 2025 के विधानसभा चुनाव में भी एनडीए के भीतर जदयू को दावेदार माना जा रहा है। हालांकि इस बार प्रशांत किशोर की पार्टी जन सुराज भी मैदान में  है, जो मुकाबले को त्रिकोणीय बना सकती है।

 

जातीय समीकरण की बात करें तो यादव समुदाय यहां सबसे बड़ा और निर्णायक मतदाता समूह है। 2020 के चुनाव में यादव मतदाताओं की संख्या 45,574 (14.5%) थी। अनुसूचित जाति के 44,789 (14.25%) और मुस्लिम मतदाताओं के 35,516 (11.3%) वोट भी महत्वपूर्ण हैं। इतिहास गवाह है कि अब तक हुए 12 चुनावों में से 8 बार यादव प्रत्याशी ही विजयी रहे। कोयरी समुदाय के मतदाता दूसरे बड़े समूह के रूप में प्रभाव रखते हैं। जानकारों का मानना है कि अगर राजद इस चुनाव में गैर यादव को उम्मीदवार बनाया तो चुनावी समीकरण उसके हित में जा सकता है…लेकिन बाबूबरही की असली चुनौती राजनीति से इतर है। यह इलाक़ा पूरी तरह ग्रामीण है और आज भी विकास के कई मोर्चों पर पिछड़ा हुआ है। 2020 में यहां 61.01% मतदान हुआ, जो हाल के वर्षों का सर्वाधिक था। 2024 तक मतदाताओं की संख्या बढ़कर 3,21,752 हो गई, लेकिन पलायन की समस्या बनी रही। युवाओं का रोजगार की तलाश में बाहर जाना आज भी यहां की सामाजिक-आर्थिक हकीकत है। बाढ़ इस क्षेत्र की सबसे गंभीर समस्या है।

 

हर साल बागमती और कमला नदियां गांवों को जलमग्न कर देती हैं, फसलें तबाह होती हैं और लोगों को पलायन के लिए मजबूर होना पड़ता है। पर्यटन और सांस्कृतिक धरोहर को विकसित करने की दिशा में भी अपेक्षित प्रयास नहीं हो सके। त्रिवेणी संगम पिपराघाट पर लगने वाला प्रसिद्ध मेला अब तक राजकीय दर्जा नहीं पा सका। इससे न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था को बल मिल सकता था बल्कि सांस्कृतिक पहचान को भी सहेजा जा सकता था। इसी तरह लाखों रुपये ख़र्च कर बनाए गए पीकू सेंटर का संचालन ठप है। स्वास्थ्य सेवाओं की हालत यह है कि स्थानीय अस्पताल में चिकित्सकों का अभाव बना रहता है।

ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों की उपेक्षा भी विकास की तस्वीर बयान करती है। राजा बलि का गढ़, राजा पद्मसिंह की राजधानी धरहरवा डीह, लक्ष्मी नारायण मंदिर, सर्रा का मदनेश्वर स्थान मंदिर, खोजपुर का सोमनाथ महादेव मंदिर और पिपराघाट का त्रिवेणी संगम ये सभी स्थल संरक्षण और सुविधाओं के अभाव में जर्जर हालत में हैं। स्थानीय जनता बार-बार  रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, बाढ़ नियंत्रण और बुनियादी ढांचे की समस्याओं के समाधान की मांग करती रही है लेकिन इसका  अभाव खुब देखने को मिलता है…

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