पुराने घाव पर नई सियासी चोट…क्या है शिल्पी-गौतम हत्याकांड 

Shilpi Jain Murder Case: बिहार की सियासत में एक बार फिर 26 साल पुराना घाव हरा हो उठा है। जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर द्वारा उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी पर शिल्पी-गौतम हत्याकांड में ‘राकेश’ नाम से संलिप्त होने का आरोप लगाना और इसके जवाब में सम्राट चौधरी का पलटवार, न केवल वर्तमान राजनीति में तूफ़ान ला रहा है, बल्कि उस त्रासद और शर्मनाक घटना को भी दोबारा सुर्खियों में ला रहा है, जिसने बिहार की कानून-व्यवस्था और न्यायिक प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े किए थे।

प्रशांत किशोर ने सोमवार को पटना में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर दावा किया कि सम्राट चौधरी, जिन्हें उस समय ‘राकेश’ नाम से पहचाना गया, 1999 के शिल्पी-गौतम मामले में संदिग्ध अभियुक्त रहे हैं। उन्होंने कहा कि सीबीआई ने सम्राट से पूछताछ की थी और डीएनए सैंपल भी लिया था, लेकिन तत्कालीन लालू-राबड़ी शासन ने साधु यादव को बचाने के लिए केस को दबा दिया। पीके ने सम्राट पर छह हत्याओं के आरोप लगाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से उनकी बर्खास्तगी की मांग की।

जवाब में सम्राट चौधरी ने प्रशांत किशोर को ‘नौसिखिया’ बताते हुए कहा कि पीके जिस राकेश का नाम ले रहे हैं, वह हाजीपुर का एक व्यापारी था, उनका नाम नहीं। सम्राट का कहना है कि राजनीतिक लाभ के लिए बेबुनियाद आरोप लगाए जा रहे हैं।

चलिए आपको बताते हैं आखिर किया है शिल्पी-गौतम हत्या कांड….इन आरोप-प्रत्यारोपों के बीच 3 जुलाई 1999 की वह भयावह रात याद आती है, जब पटना के फ्रेजर रोड स्थित सरकारी क्वार्टर नंबर 12 के गैरेज में एक सफेद मारुति कार से 23 वर्षीय शिल्पी जैन और लंदन में पढ़ रहे 24 वर्षीय गौतम सिंह की अर्धनग्न लाशें बरामद हुई थीं। शिल्पी, जो कभी ‘मिस पटना’ रह चुकी थीं, एक मध्यमवर्गीय कपड़ा व्यापारी की बेटी थीं, जबकि गौतम एनआरआई परिवार से आते थे और राजनीति में रुचि रखते थे। दोनों की दोस्ती धीरे-धीरे रिश्ते में बदल रही थी।

घटना की शुरुआती पुलिस जांच ने इसे आत्महत्या करार दिया, लेकिन पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में बलात्कार और हिंसक हमले के संकेत मिले। जनदबाव के बाद केस सीबीआई को सौंपा गया। जांच में साधु यादव का नाम बार-बार आया। डीएनए सैंपल की मांग की गई, मगर साधु यादव ने देने से इनकार कर दिया। सबूतों से छेड़छाड़ और पुलिस की भूमिका पर गंभीर सवाल उठे। अंततः 2003 में सीबीआई ने इसे ‘दोहरी आत्महत्या’ बताते हुए केस बंद कर दिया। शिल्पी के भाई ने न्याय के लिए लड़ाई जारी रखी, लेकिन 2006 में उनका अपहरण हो गया और मामला ठंडे बस्ते में चला गया। आज, जब यह मामला दोबारा सियासी बहस के केंद्र में है, तब सवाल उठता है कि इतने सालों बाद भी इस हाई-प्रोफाइल केस के सवाल का कोई जवाब क्यों नहीं हैं। तो दूसरी तरफ क्या यह सिर्फ एक चुनावी हथियार है या सचमुच न्याय की मांग? इन सवालों के बीच एक बात तो है कि शिल्पी और गौतम के साथ जो हुआ, वह एक समाज के रूप में हमारी सामूहिक विफलता थी और आज भी बनी हुई है।

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