Bodhgaya vidhanshabha seat: बुद्ध की ज्ञान स्थली बोधगया एक बार फिर राजनीतिक रणभूमि पाने को तैयार है. 2020 में मात्र 4275 वोटो से तय हुई जीत इस सीट पर अब सभी की निगाहें टिकी हुई है. क्या कुमार सर्वजीत तीसरी बार इतिहास रचेंगे या हरी मांझी की वापसी होगी? 14 नवंबर को खुलने वाली मत पेटियां सिर्फ जीत हार नहीं बल्कि बिहार की भविष्य की राजनीति की दिशा भी तय करेगी.
बोधगया की राजनीति कहानी शुरू होती है 1960 के दशक से जब यहां कांग्रेस का वर्चस्व था. उस समय भारतीय राजनीति में कांग्रेस का दबदबा था, और बोधगया भी इससे अछूता नहीं था. कांग्रेस ने यहां दो बार जीत हासिल की लेकिन धीरे-धीरे राजनीतिक समीकरण बदलने लगे जन संघ स्वतंत्र पार्टी और जनता पार्टी ने भी एक-एक बार अपना परचम लहराया. लेकिन 1970 से 1990 के बीच का दौर वामपंथी दलों का रहा. सीपीआई ने तीन बार यहां जीत दर्ज कर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई. 90 के दशक के बाद बोधगया में राजद का प्रभुत्व शुरू हुआ, लालू प्रसाद यादव की लोकप्रियता और सामाजिक न्याय के झंडे ने राजद को यहां मजबूत पकड़ दी. आज तक राजद ने इस सीट को सबसे ज्यादा पांच बार जीता है..वही जेडीयू को यहां कभी जीत नहीं मिली, नीतीश कुमार की पार्टी बिहार में लंबे समय तक सत्ता में रही लेकिन बोधगया उनके लिए हमेशा चुनौती पूर्ण बनी रही.
बात करें पिछले दो विधानसभा चुनाव की तो 2020 का विधानसभा चुनाव बोधगया के इतिहास में सबसे करीबी मुकाबले में से एक रहा है. राजद के कुमार सर्वजीत ने 80196 वोट हासिल किया जबकि भाजपा के हरि मांझी को 75921 वोट मिले जीत का अंतर मात्र 4275 वोटो का ही था. यह चुनाव आखिरी दौर तक रोमांचक रहा दोनों उम्मीदवारों ने जमीनी स्तर पर जबरदस्त मुहिम चलाई थी. इस चुनाव में कुल मतदान प्रतिशत 54 फीसीदी था. वही 2015 का चुनाव बिहार में महागठबंधन का जीत का प्रतीक था राजद जेडीयू और कांग्रेस ने मिलकर बिहार में शानदार जीत हासिल की थी. बोधगया में भी इस लहर का असर दिखा और कुमार सर्वजीत ने राजद के टिकट पर पहली बार जीत दर्ज की थी.
बिहार में दो चरणों में होने वाले विधानसभा चुनाव में बोधगया एक बार फिर चर्चा में है. 14 नवंबर को जो वोटो की गिनती होगी तब तय होगा कि इस बार सत्ता की बागडोर किसके हाथ में जाती है. एनडीए गठबंधन में बीजेपी जेडीयू और लोजपा शामिल है. महागठबंधन में राजदा कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दल है. दूसरी ओर कुमार सर्वजीत अपनी हैट्रिक पूरी करने के लिए मैदान में है, लगातार दो बार की जीत से उनका आत्मविश्वास बुलंद है. उनके पास मजबूत जमीनी कार्यकर्ता है, और पिछले 5 वर्षों में किए गए विकास कार्यो का लाभ भी उन्हें मिल सकता है
पिछले दो चुनाव के आंकड़ों का विश्लेषण करें तो कुछ रोचक तथ्य सामने आते हैं 2015 में मतदान प्रतिशत 57 से सीधी था तो 2020 में घटकर 54 फीसदी रह गया कम मतदान आमतौर पर सत्ताधारी गठबंधन के खिलाफ जाता है. 2020 में राजदा और बीजेपी के बीच वोटो का अंतर मात्र 2.5% था. इसका मतलब है कि केवल 3 से 4 प्रतिशत वोटो का स्विंग पूरी तरह से परिणाम बदल सकता है.
2025 का चुनाव भी करीबी मुकाबले का संकेत दे रहा है कुमार सर्वजीत की मजबूती जमीनी उपस्थिति और राजदा का पारंपरिक वोट बैंक उन्हें बढ़त दे सकता है, लेकिन बीजेपी के संगठनात्मक केंद्र सरकार का लाभ और हरी मांझी का अनुभव उन्हें प्रतिस्पर्धी बन सकता है. अब देखना यह होगा की 14 नवंबर को जब मत पेटियां खुलेंगी तो जीत किसके खाते में जाती है.