Pawan singh controversy: भोजपुरी सुपरस्टार पवन सिंह की बीजेपी में दोबारा वापसी को लेकर पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं में गुस्सा और नाराजगी का माहौल बना हुआ है. भोजपुर भाजपा के प्रदेश कार्य समिति के सदस्य शंभु चौरसिया ने सोमवार को बातचीत में पवन सिंह की वापसी पर खुलकर नाराजगी जताई और कहां की सेलिब्रिटी से पार्टी का कोई फायदा नहीं होने वाला.
शंभू चौरसिया जो 38 साल से भाजपा से जुड़े हुए हैं, और तीन बार भोजपुर जिला भाजपा के उपाध्यक्ष रह चुके हैं, ने साफ शब्दों में कहा पवन सिंह नाचने गाने वाले हैं. वे सेलिब्रिटी है उनके भाजपा में आने से पार्टी का कोई फायदा नहीं होगा. मैं जमीनी स्तर पर काम करता हूं मुझे पता है कि सेलिब्रिटी के पार्टी में आने से वोट पर कोई असर नहीं होता.
शंभू चौरसिया ने यह भी कहा कि जो कार्यकर्ता पिछले 10, 20, 30 साल से पार्टी का झंडा डंडा उठा रहे हैं. उन जमीनी कार्यकर्ताओं को दरकिनार करना और उन्हें तवज्जो नहीं देना बिल्कुल ठीक नहीं है. उन्होंने कहा कि सेलिब्रिटी को महत्व देने से पुराने और वफादार कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटता दिखाई देता है.
शंभू चौरसिया ने पवन सिंह की चुनावी क्षमता पर भी सवाल उठाते हुए कहा, अगर पवन सिंह निर्दलीय भी चुनाव लड़ जाए तो पार्टी के कैंडिडेट को कोई फर्क नहीं पड़ेगा. पवन सिंह स्टार प्रचारक है, भीड़ जुटा सकते हैं, लोग जुटा सकते हैं, लेकिन उस भीड़ को वोट में तब्दील नहीं कर सकते. उन्होंने इसकी तुलना कांग्रेस के स्टार प्रचारक को से करते हुए कहा, सोनिया गांधी भी आती है, राहुल गांधी भी आते हैं, काफी भीड़ होती है लेकिन क्या भीड़ वोट में तब्दील होती है?
शंभू चौरसिया ने पवन सिंह के पिछले साल की विवादास्पद फैसले को याद दिलाते हुए कहा, कि भाजपा ने 2024 में उन्हें आसनसोल लोकसभा सीट पर अपना प्रत्याशी बनाया था, लेकिन पवन सिंह ने पार्टी के आदेश का अनादर करते हुए टिकट लौटा दिया, बल्कि पार्टी लाइन से हटकर काराकाट लोकसभा सीट से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनावी मैदान में उतर गए. इस फैसले का खामियाजा एनडीए प्रत्याशी उपेंद्र कुशवाहा को उठाना पड़ा था. उन्होंने आगे कहा जिस व्यक्ति ने पार्टी के आदेश का अनादर किया उसे दोबारा पार्टी में शामिल कर लिया गया यह गलत संदेश है.
पवन सिंह के वापसी को लेकर भाजपा के भीतर उतरे सवाल पार्टी के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकते हैं. एक तरफ जहां पार्टी सेलिब्रिटी का इस्तेमाल जनता तक अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए कर रही है. वहीं दूसरी तरफ जमीनी कार्यकर्ताओं की नाराजगी पार्टी की एकता और मजबूती के लिए खतरा बनती जा रही है. बिहार में आगामी चुनाव को देखते हुए यह देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा इस आंतरिक विरोध को कैसे संभालती है, और क्या पवन सिंह वाकई में पार्टी के लिए वोट बैंक साबित हो पाएंगे या नहीं..?