उम्मीदवारों को क्यों मिलता है चुनाव चिह्न ? जानिए पार्टी सिंबल को लेकर क्या है भारत में नियम

Chunav chinh: क्या आपने कभी सोचा है कि भारत जैसे देश में जहां करोड़ों लोग अपना नाम पढ़ नहीं सकते वह कैसे अपने मनपसंद नेता को वोट देते हैं? जवाब छुपा है मत पत्र पर छापे उन छोटे-छोटे चिन्ह में, यह महज कोई डिजाइन नहीं बल्कि लोकतंत्र की रीढ़ है, जो हर नागरिक को चाहे वह पढ़ा लिखा हो या नहीं सामान राजनीतिक शक्ति प्रदान करती है. जब चुनाव आयोग ने इस व्यवस्था की नींव रखी तो उसने एक गहरी सच्चाई को समझा था. शिक्षा की कमी किसी के मत अधिकार में बाधा नहीं बननी चाहिए, एक साधारण सा चिन्ह वह भाषा बन जाता है, जिससे हर कोई समझ सकता है चाहे वह किसी भी राज्य जाती है वर्ग से हो. यही वजह है कि राजनीतिक दल अपने चुनाव चिन्ह को लेकर बेहद संवेदनशील होते हैं, और उन्हें अपनी पहचान का अभिन्न अंग मानते हैं.

राष्ट्रीय दलों का अनमोल खजाना

पूरे भारत में कहीं भी कमल सिर्फ एक ही दल का है और पंजा सिर्फ एक का यह सहयोग नहीं बल्कि चुनाव आयोग की सुविचारित रणनीति है. ये प्रतीक केवल उसी दल के लिए सुरक्षित रहते हैं, और देश के किसी भी कोने में किसी अन्य उम्मीदवार को नहीं दिए जाते हैं. मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों को मिलने वाला या विशेषाधिकार उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर एक अमिट पहचान देता है.

भारतीय जनता पार्टी का कमल, कांग्रेस का पंजा, बसपा का हाथी, सपा की साइकिल, यह प्रतिक दशकों से जनमानस में इतनी गहरे बस गए हैं कि इन्हें देखते ही मतदाता तुरंत अपनी पार्टी को पहचान लेती है. कश्मीर से कन्याकुमारी तक गुजरात से असम तक हर जगह यही चीज यही पहचान है. यह स्थायित्व राजनीतिक दलों के लिए अमूल्य है, उन्हें बार-बार नई पहचान बनाने की जरूरत नहीं होती एक बार जनता के दिलों दिमाग में जगह बना लेने के बाद वह प्रतीक पीढ़ियों तक उनकी विरासत बन जाती है.

दो निर्वाचन क्षेत्र एक साझा पहचान

छोटे राजनीतिक दलों के लिए भी चुनाव आयोग ने एक दिलचस्प व्यवस्था रखी है यदि कोई पंजीकृत पार्टी कम से कम दो लोकसभा सीटों पर या किसी राज्य की विधानसभा की 5% सीटों पर चुनाव लड़ती है, तो उसे एक अस्थाई साझा प्रतीक मिल सकता है. यह व्यवस्था उभरते राजनीतिक दलों को एक सामूहिक ब्रांडिंग का मौका देती है, भले ही चिन्ह स्थाई ना हो लेकिन उस चुनाव में यह दल के सभी उम्मीदवारों को एक धागे में पिरो देता है. मतदाता जब मत पत्र देखाता है तो उसे एहसास होता है, कि यह सभी उम्मीदवार एक ही विचारधारा का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं.

निर्दलीयों उम्मीदवारों के लिए प्रक्रिया

निर्दलीय उम्मीदवारों और छोटे राजनीतिक दलों के लिए चुनाव चिन्ह आवंटक की प्रक्रिया पूरी तरह से पारदर्शी और निष्पक्ष है. चुनाव चिन्ह आदेश 1968 के अनुसार प्रत्येक निर्दलीय उम्मीदवार को नामांकन पत्र भरते समय अपनी वरीयता से के क्रम में तीन मुक्त चिन्ह चुनने होते हैं. रिटर्निंग ऑफिसर सबसे पहले उम्मीदवारों की प्रथम पसंद पर विचार करता है यदि वह चिन्ह उपलब्ध है और किसी पंजीकृत राजनीतिक दल के उम्मीदवार ने उसे अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता के रूप में नहीं चुना तो वह उम्मीदवार को आवंटित कर दिया जाता है. यदि प्रथम पसंद उपलब्ध नहीं है तो द्वितीय और फिर तृतीय विकल्प पर विचार किया जाता है. यदि तीनों विकल्प समाप्त हो जाए तो रिटर्निंग ऑफिसर कोई अन्य उपलब्ध चिन्ह आवंटित करता है.

जब दो उम्मीदवार चाहे एक ही चिन्ह

कई बार ऐसा होता है कि एक से अधिक उम्मीदवारों की प्रथम वरीयता एक ही चुनाव चिन्ह होती है. ऐसी स्थिति में लॉटरी या ड्रॉ की व्यवस्था की जाती है. यह प्रक्रिया पूरी तरह से पारदर्शी तरीके से संपन्न होती है, और सभी संबंधित उम्मीदवारों की उपस्थिति में की जाती है. यह सुनिश्चित करता है कि किसी भी उम्मीदवार के साथ पक्षपात न हो और हर किसी को सम्मान अवसर मिले.

पूर्व सांसद विधायकों को मिलती है प्राथमिकता

चुनाव आयोग ने वर्तमान सांसदों और विधायकों के लिए एक विशेष प्रावधान किया यदि कोई मौजूदा सांसद या विधायक निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ रहा है, तो उसे बिना लॉटरी के उसका पिछला चुनाव आवंटित किया जाता है. यह प्रावधान इसलिए बनाया गया है क्योंकि मतदाता उसे पति से पहले से परिचित होते हैं और भी उसे विशेष चिन्ह को उसे नेता से जोड़ते हैं.

रोजमर्रा की वस्तुओं से बना चिन्हों का खजाना

भारतीय चुनाव आयोग द्वारा मुक्त चिन्हों की जो सूची तैयार की गई है, वह अत्यंत रोचक और व्यावहारिक है. इसमें ऐसी वस्तुएं शामिल है जो आम भारतीय के दैनिक जीवन का हिस्सा है, ऑटो, रिक्शा, गुब्बारा, कैमरा, पंखा, केतली, प्रेशर कुकर और टेलीविजन जैसे चिन्ह इस सूची में शामिल है. चुनाव आयोग समय–समय पर इस सूची को अपडेट करता रहता है. नए प्रतीक जोड़े जाते हैं और कुछ पुराने हटाए भी जा सकते हैं, यह सुनिश्चित करता है की प्रति की पर्याप्त संख्या हमेशा उपलब्ध रहे और उम्मीदवारों को विकल्प मिलते रहे.

प्रतीकों में छुपा लोकतंत्र का गणित

चुनाव चिन्हों की यह पूरी व्यवस्था भारतीय लोकतंत्र की गहन समझ को दर्शाती है. यह मान्यता है कि मतदान का अधिकार साक्षरता पर निर्भर नहीं होना चाहिए ल, एक क्रांतिकारी अवधारणा है. चुनाव चिन्ह इसी अवधारणा को मूर्त रूप देता है. आज जब भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, और करोड़ों लोग मतदान में भाग लेते हैं तो इन साधारण से दिखने वाले प्रतीकों का महत्व और भी बढ़ जाता है, हर चुनाव में यह मुख्य प्रतीक लाखों आवाजों को अभिव्यक्ति देता है, और भारतीय लोकतंत्र को मजबूत बनाता है.

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