Voter Adhikar Yatra : बिहार में इन दिनों कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) की ‘वोटर अधिकार यात्रा’ चर्चा में है. राहुल गांधी और तेजस्वी यादव के नेतृत्व में निकाली जा रही यह यात्रा एक ओर जहां मतदाता अधिकार, OBC आरक्षण और सामाजिक न्याय जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों को केंद्र में ला रही है, वहीं दूसरी ओर इसमें दक्षिण और तेलंगाना के कुछ ऐसे नेताओं की भागीदारी पर सवाल उठ रहे हैं, जिन पर अतीत में बिहार और उत्तर भारत को लेकर विवादास्पद टिप्पणियों के आरोप लग चुके हैं.
हाल ही में इस यात्रा के दौरान तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन, डीएमके नेता कनिमोझी और तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी बिहार पहुंचे. मंच से भाषण दिए, जनता से संवाद किया और विपक्षी एकता का संदेश दिया. लेकिन इस राजनीतिक सौहार्द के पीछे कुछ तल्ख सवाल छिपे हैं, क्या ऐसे नेताओं की उपस्थिति बिहार के मतदाताओं को यह यकीन दिला पाएगी कि यह गठबंधन उनके आत्मसम्मान और सांस्कृतिक अस्मिता को समझता और सम्मान देता है ? दरअसल,स्टालिन और उनकी पार्टी डीएमके पर हिंदी विरोधी रुख अपनाने के आरोप लंबे समय से लगते रहे हैं. रेवंत रेड्डी भी बिहार की जनभावनाओं के प्रति असंवेदनशील टिप्पणी के लिए विवादों में रह चुके हैं. ऐसे में इन नेताओं को बिहार बुलाकर महागठबंधन क्या संदेश देना चाहता है? क्या यह विपक्ष की एकता का प्रदर्शन है या फिर एक रणनीतिक चूक?
इस यात्रा से कांग्रेस की मंशा स्पष्ट है कि वह OBC आरक्षण, सामाजिक न्याय और मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाना चाहते हैं. शायद इसलिए भी स्टालिन और रेवंत रेड्डी जैसे नेताओं को मंच पर लाकर यह बताने की कोशिश की जा रही है कि इंडिया गठबंधन केवल एक चुनावी गठजोड़ नहीं, बल्कि देशव्यापी सामाजिक परिवर्तन की आकांक्षा है. यह संदेश देना कि बिहार की लड़ाई, सिर्फ बिहार की नहीं है बल्कि यह लोकतंत्र और प्रतिनिधित्व के मूल्यों की लड़ाई है. मुजफ्फरपुर में स्टालिन का तमिल में भाषण देना और चुनाव आयोग पर रिमोट कंट्रोल की टिप्पणी करना यह संकेत देता है कि महागठबंधन का फोकस अब राष्ट्रीयता की परिभाषा को क्षेत्रीय और भाषायी विविधताओं से जोड़कर फिर से गढ़ने का है.
लेकिन बिहार में क्षेत्रीय स्वाभिमान और भाषा-संवेदनशीलता अत्यंत मजबूत है. जिसके कारण यह भी कहा जा रहा है कि राहुल तेजस्वी पर यह दांव उल्टा पड़ सकता है?हालांकि भाजपा इस मौके को भुनाने में जुट गई है. स्टालिन की उपस्थिति से पहले ही तमिलनाडु बीजेपी नेता अन्नामलाई ने उनके पुराने हिंदी विरोधी बयानों को सामने लाकर कांग्रेस पर निशाना साधा. उन्होंने पूछा कि क्या स्टालिन वही टिप्पणियां बिहार की भूमि पर भी दोहराएंगे? भाजपा का यह नैरेटिव सीधा बिहारी गौरव से जुड़ता है, जो राज्य में एक भावनात्मक मुद्दा बन चुका है. कांग्रेस और राजद को यह समझना होगा कि भले ही उनका उद्देश्य विपक्षी एकता को प्रदर्शित करना हो, लेकिन राजनीति केवल इरादों से नहीं, प्रतीकों से भी संचालित होती है. और स्टालिन या रेड्डी जैसे नेताओं की छवि कई बिहारी मतदाताओं के लिए विवादस्पद प्रतीक बन सकती है.
इंडिया गठबंधन अगर बिहार जैसे राज्य में अपनी पैठ मजबूत करना चाहता है, तो उसे सामाजिक न्याय और विपक्षी एकता के अपने एजेंडे को क्षेत्रीय अस्मिता और सांस्कृतिक संवेदनशीलता के साथ संतुलित करना होगा. दक्षिण भारत के नेताओं की भागीदारी राष्ट्रीय स्तर पर ताकत दिखा सकती है, लेकिन स्थानीय स्तर पर इसका असर उल्टा भी पड़ सकता है,यदि उसमें बिहारी जनता की भावनाओं के प्रति सम्मान और संवाद की भावना न हो. इतिहास बताता है कि बिहार केवल एक चुनावी रणभूमि नहीं है बल्कि यह एक चेतन राजनीतिक समाज है, जो आत्मगौरव, भाषा और इतिहास के प्रति अत्यधिक सचेत है. महागठबंधन को यह समझना होगा कि विपक्षी एकता का मतलब केवल मंच साझा करना नहीं,बल्कि जनभावनाओं के साथ जुड़ना भी है.