राहुल गांधी नहीं चाहते…तेजस्वी यादव मुख्यमंत्री बनें ? चुप्पी का क्या है मतलब

Voter Adhikar Yatra : बिहार की सियासत में इन दिनों एक नई बयार बह रही है.अररिया में राहुल गांधी और तेजस्वी यादव की साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस ने स्पष्ट कर दिया है कि कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल (राजद)के बीच केवल राजनीतिक गठबंधन ही नहीं,बल्कि विचारधारा का भी मेल बन चुका है.इस मंच पर राहुल गांधी ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सख्त सवाल खड़े किए और केंद्र की मोदी सरकार पर लोकतंत्र को कमजोर करने का आरोप लगाया.

राहुल गांधी ने एक बार फिर से अपना आरोप दोहराते हुए कहा  कि चुनाव आयोग उन राज्यों में सही मतदाता सूची तक नहीं दे पाया,जहां विपक्ष की स्थिति मजबूत है  जैसे महाराष्ट्र, हरियाणा और कर्नाटक. यह चिंता केवल एक राजनीतिक बयान नहीं,बल्कि लोकतंत्र की नींव पर उठता प्रश्न है.यदि मतदाता सूची में ही गड़बड़ी हो, तो निष्पक्ष चुनाव की कल्पना कैसे की जा सकती है? हालांकि राहुल गांधी बिहार चुनाव को लेकर कुछ बड़े स्तर पर बोलने से परहेज करते दिखे.

प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान जब एक पत्रकार ने राहुल गांधी से यह सीधा सवाल पूछा कि यदि बिहार में विपक्षी गठबंधन सत्ता में आता है तो क्या तेजस्वी यादव मुख्यमंत्री होंगे तो उन्होंने इस पर स्पष्ट जवाब नहीं दिया. हालांकि राहुल गांधी ने यह जरूर दोहराया कि कांग्रेस और राजद के बीच संबंध पूरी तरह संतुलित और भरोसे पर आधारित हैं और उन्होंने इस गठबंधन को आईडियोलॉजिकली और पॉलिटिकली अलाइंड बताया.ज्ञात हो कि इस सवाल और इसपे राहुल गांधी की चुप्पी का मतलब इसलिए बी जरूरी है क्योंकि इसी वोटर अधिकार यात्रा के दौरान तेजस्वी यादव यह स्पष्ट कर चुके हैं कि अगर विपक्ष सत्ता में आता है तो प्रधानमंत्री के रूप में वे राहुल गांधी को देखना चाहेंगे. तो यह सवाल और भी अहम हो जाता है कि राज्य स्तर पर नेतृत्व को लेकर कांग्रेस क्यों अस्पष्ट है?

राहुल गांधी ने वोटर अधिकार यात्रा को सफल बताते हुए दावा किया कि बिहार की जनता वोट चोरी को एक वास्तविक खतरा मान रही है. बेरोजगारी, गरीबी और पलायन जैसे मुद्दे भी उनके निशाने पर रहे.उनका कहना है कि युवाओं के भविष्य के सारे दरवाजे बंद हो चुके हैं और देश की संपत्ति कुछ गिने-चुने उद्योगपतियों को सौंप दी गई है.

इन बयानों के केंद्र में एक स्पष्ट सियासी रणनीति दिखती है भाजपा और उसके नेतृत्व के खिलाफ जनमत को मजबूत करना और एक वैकल्पिक सामाजिक-आर्थिक एजेंडा पेश करना. लेकिन इस वैकल्पिक एजेंडे की विश्वसनीयता तभी बनेगी,जब विपक्षी गठबंधन बिहार में नेतृत्व को लेकर भी उतना ही पारदर्शी और स्पष्ट होगा जितना वो दिल्ली में बनना चाहता है.बिहार में विपक्ष की यह साझेदारी एक नया राजनीतिक अध्याय लिख सकती है,लेकिन इस साझेदारी की ईमानदारी और मजबूती तभी साबित होगी जब यह नारे और आरोपों से आगे बढ़कर ठोस नेतृत्व और स्पष्ट नीति की झलकियां दिखाएं.

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