मुख्यमंत्री हो या राजनीति नीतीश कुमार का दूसरा ऑप्शन नहीं है..! क्या कैजुअल पॉलिटिक्स की भेंट चढ़ रहा बिहार? 

Bihar politics: कैजुअल पॉलिटिक्स समझते हैं…2025 का विधानसभा चुनाव वैसा ही फिल दे रहा है। इसके साथ साथ हाईकमान में हम बड़े तो हम बड़े की जंग भी जारी हैं… दरअसल बिहार की राजनीति में इस बार एक अलग ही मिज़ाज देखने को मिल रहा है , जैसे किसी कैज़ुअल मीट-अप का सीज़न चल रहा हो। 2025 का विधानसभा चुनाव नज़दीक है, लेकिन चुनावी माहौल में वह पुराना जोश, वह ज़मीनी हलचल और रणनीतिक आक्रामकता कहीं कमज़ोर पड़ती दिख रही है। ऐसा लग रहा है जैसे नेता चुनाव को अब उतनी गंभीरता से लेते नहीं दिख रहे, जितनी जनता आज भी राजनीति से उम्मीद करती है।

ऊपर से हाईकमान राजनीति की एक अलग पटकथा चल रही है , हम बड़े या हम और बड़े का शक्ति-संघर्ष। इस बीच बीते शुक्रवार को जब बारिश हो रही थी, तो कई बड़े नेता अपने-अपने घरों में बैठे चाय-पकोड़े का आनंद लेते दिखे। लेकिन उसी समय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पटना से करीब 200 किलोमीटर दूर छह विधानसभा क्षेत्रों में लगातार दौरे करते हुए दिखाई दिए। यह दौरे खासतौर पर उन सीटों पर थे, जहां एनडीए की स्थिति कमजोर मानी जा रही है। ऐसे मौके पर सड़क पर उतरना यह संकेत देता है कि नीतीश अभी भी चुनावी ज़मीन को लेकर गंभीर हैं और आख़िरी पलों में भी समीकरण साधने की कोशिश में हैं।

उधर तेजस्वी यादव और विपक्ष के अन्य बड़े नेता खराब मौसम का हवाला देते रहे और हेलीकॉप्टर उड़ान न भर पाने को वजह बताया। सवाल यह नहीं कि मौसम ने रोका या नहीं बल्कि सवाल यह है कि जब चुनावी मैदान गरम है तो नेताओं की मौजूदगी कहाँ है? जनता यह समझना चाहती है कि जो नेता सत्ता पाने या सत्ता बचाने की जंग लड़ रहे हैं, वे मैदान में दिख क्यों नहीं रहे?

बिहार की राजनीति में जो बदलाव दिख रहा है, वह चिंता का विषय भी है और संकेत भी। चिंता इसलिए क्योंकि बिहार में राजनीति तो हमेशा जारी रहती है लेकिन इसमें उफान चुनवा के दौरान आता है। अभी चुनावी माहौल है लेकिन जो नेता कभी साइकिल, नाव और पैदल चलकर गांव-गांव जाते थे, वे अब मौसम और मशीनरी पर निर्भर दिखते हैं। और संकेत इसलिए कि राजनीति की शैली बदल रही है ,सोशल मीडिया शो, प्रतीकात्मक सभाएं और सीमित पब्लिक अप्रोच ही अब नई रणनीति बनती जा रही है।

कुल मिलाकर कहा जाए तो इस बार बिहार में कैज़ुअल पॉलिटिक्स की झलक साफ है। हालांकि, इस लापरवाही वाले खेल में फिलहाल नीतीश कुमार बाकी नेताओं से एक कदम आगे दिखाई दे रहे हैं ,चाहे एनडीए हो या महागठबंधन, दोनों ही कई जगह पीछे और सुस्त दिखते हैं।

जब मुद्दे गंभीर हों, बेरोज़गारी और पलायन जैसे सवाल खड़े हों, तो जरूरत गंभीर सोच और ज़मीनी राजनीति की होती है। जो नहीं दिख रहा ऐसे में सवाल वही है, क्या बिहार कैज़ुअल पॉलिटिक्स के लिए तैयार है? इस तरह की राजनीति को जनता स्वीकार करेगी?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *