Maithili Thakur Vs Vinod Mishra : कहते है जिस ओर जवानी चलती है, उस ओर जमाना चलता है। चुनावी राजनीति में इसके अपने मायने जरूर है लेकिन यह तो तय रहता है कि जवानी यानी की युवा वोटर किसी के जीत हार में बड़ा फैक्टर होते हैं.इसके साथ साथ बीते कुछ चुनाव से एक और बड़ा अहम फैक्टर है जिसे महिला वोटर कहा जाता है. यानी की आधी आबादी. अब देखें तो बिहार में विधानसभा चुनाव की तैयारियां रफ्तार पकड़ चुकी है। पहले चरण के मतदान में अब बस चंद दिन शेष हैं और इस चरण के लिए प्रचार-प्रसार भी अंतिम दौर में है। वैसे तो 243 सीटों में कई सीटें पार्टी के लिए हार-जीत की प्रतिष्ठा से जुड़ चुकी हैं, लेकिन इन सबके बीच दरभंगा जिले की अलीनगर विधानसभा सीट इस बार कुछ खास चर्चा में है। चुनाव तिथियों की घोषणा के साथ ही यह सीट सुर्खियों में आ गई, और आज भी बहस का केंद्र बनी हुई है।
अलीनगर से भाजपा ने युवा गायिका मैथिली ठाकुर को टिकट देकर बड़ा दांव खेला है। 25 वर्ष पूरा होते ही मैदान में उतरीं मैथिली बिना किसी राजनीतिक अनुभव के चुनावी समर में हैं। भाजपा ने स्थानीय दावेदारों को किनारे कर उन पर भरोसा जताया है। जिसको लेकर शुरुआत से ही कई विवाद उनके साथ जुड़ गए. पैराशूट कैंडिडेट, लेटरल एंट्री और राजनीति में अनुभवहीनता को लेकर पहले भाजपा कार्यकर्ताओं में शुरू हुआ विरोध खेमें तक पहुंच गया जब मैथिली के एक सभा में पाग को लेकर विवाद में घिर गई. हालांकि इन सबके बीच सच्चाई यह है कि अब वो राजनीति में है. राजनीति से पहले मैथिली गायन से पहचान बना चुकी थीं, लेकिन गायकी में मिली लोकप्रियता अब राजनीति में कितनी मदद देगी, यह चुनाव नतीजे तय करेंगे।
वैसे तो इस सीट से कुल 12 उम्मीदवार मैदान में है लेकिन राजद प्रत्याशी विनोद मिश्रा इस मुकाबले के प्रमुख चेहरे हैं। जो 2020 में भाजपा छोड़ राजद में आए और टिकट भी मिला, हालांकि वे केवल 3100 वोटों से पीछे रह गए। हालांकि इस बार भी राजद ने उन पर भरोसा जताया है और मुख्य मुकाबले में भी हैं. एक लंबे राजनीतिक अनुभव के साथ स्थानीय नेता होना तो है ही लेकिन इसके साथ साथ राजनीति की बारीक समझ के साथ यादव-मुस्लिम गठजोड़ के साथ ब्राह्मण कार्ड उनकी बड़ी मजबूती है, मिश्रा स्वयं ब्राह्मण समुदाय से आते हैं, और पार्टी का अनुमान है कि वे ब्राह्मण वोट जो की लगभग 23% है उस में सेंध लगा सकते हैं। और यही गणित राजद के लिए निर्णायक साबित हो सकता है।
अब जमीनी हकिकत और चुनावी ट्रेंड की बात करें तो मौजूदा स्थिति काफी दिलचस्प है. जातीय समीकरण के अलावा जो दुसरे बड़े फैक्टर है वो काफी अहम है. जैसे कि सोशल मीडिया पर मैथिली के प्रति विरोध तो झलकता है लेकिन जमीन पर अब तक उनके खिलाफ कोई बड़ा विरोध प्रदर्शन नहीं दिखा है इसके इतर महिला वोटरों का झुकाव मैथिली के पक्ष में दिखाई देता है. इसके साथ साथ बीते चुनाव में हार के बाद भी जमीन पर मौजूदगी के कारण विनोद मिश्रा को भी जनता की अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है। इसके अलावा स्थानीय होने के कारण पिछले चुनाव की तुलना में इस बार उनके प्रति युवाओं का समर्थन अधिक दिखाई देता है।
हालांकि ये लड़ाई केवल दो उम्मीदवारों तक सीमित नहीं है। जन सुराज से विप्लव चौधरी और अन्य निर्दलीय उम्मीदवारों के मैदान में होने से जीत और हार के अंतर को प्रभावित कर सकते हैं. 2020 की तरह वोट बिखराव इस बार भी नतीजे तय कर सकता है। पिछले चुनाव में पप्पू यादव समर्थित उम्मीदवार ने पप्पू सिंह ने 9737 वोट हासिल कर मुकाबला प्रभावित किया था। उनके अलावा चिराग पासवान के पार्टी से चुनाव लड़ने वाले राज कुमार झा ने 8850 वोट हासिल कर विनोद मिश्रा के जीत की राह में रोड़ा बन गए. इस बार भी तीन ब्राह्मण उम्मीदवार मैदान में हैं, ऐसे में ब्राह्मण मतों का बंटवारा मैथिली ठाकूर और विनोद मिश्रा की चुनौती बन सकते है। कुल मिलाकर मुकाबला रोचक है और अंतिम फैसला वोटरों के विनिबिलिटी फैक्टर पर निर्भर करेगा। युवा बनाम महिला वोटर, स्थानीय अनुभव बनाम बाहरी चेहरा, ब्राह्मण वोटों की दिशा और दूसरे उम्मीदवारों का प्रदर्शन अली नगर सीट के लिए जो निर्णायक फैक्टर है.